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पहनावे में दिखता है उनका दर्शन

Fri, 06 Jun 2014 07:54 PM IST
वैनेशा फ्रीडमैन
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एक ऐसी दुनिया में, जहां मिशेल ओबामा के पहनावे पर केंद्रित ब्लॉग उपलब्ध हैं, चुनाव से ऐन पहले फ्रांसिस ओलांद और डिल्मा रॉसेफ को कायान्तरण करना पड़ता हो और नेल्सन मंडेला की कमीज को किसी संत की पोशाक जैसा पवित्र माना जा रहा हो, वहां भारत के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मामला भी अलग नहीं है। वास्तव में जिस तरह उनकी छवि गढ़ी गई और उसका फैशन पर जो असर दिख रहा है, वह अपने आप में अध्ययन का विषय है।
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भारतीय मानकों के लिहाज से देखें, तो वहां अमूमन नेता दूसरे देशों के नेताओं की तुलना में ऐसा पहनावा पसंद करते हैं, जिससे लोगों के बीच उनकी सहज छवि बनी रहे। मसलन महात्मा गांधी ने पारंपरिक खादी की धोती को अपनाया, तो जवाहर लाल नेहरू ने खादी की जैकेट और इंदिरा तथा सोनिया गांधी ने खादी की साड़ियों को। मोदी इन सबसे बिल्कुल अलग हैं। वह आधी बांह के जिस तरह का कुर्ता पहनते हैं, उसे अब 'मोदी कुर्ता' के नाम से जाना जाता है। यह पारंपरिक भारतीय अंगरखे का परिष्कृत रूप है, जिसमें बांह आधी होती है। कुर्ते की यह डिजाइन तैयार करने वाले दर्जी और कपड़े की शृंखला जेड ब्लू के मालिक बिपिन चौहान ने इस कुर्ते का ट्रेडमार्क बना लिया है और अब वह इसे ब्रिटेन, अमेरिका और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में ले जा रहे हैं। यदि आप खुद को मोदी लुक देना चाहते हैं, तो एक ऑनलाइन बिजनेस वेबसाइट भी शुरू हो चुकी है, जिसका नाम है- मोदीमैनिया डॉट कॉम। यह बताता है कि मोदी पूरी दुनिया में एक ब्रांड बन चुके हैं।

इनसे पता चलता है कि मोदी ने सफलतापूर्वक अपनी व्यक्तिगत शैली और राजनीतिक मंच को एक-दूसरे के लाभ के लिए किस तरह आपस में मिला दिया। वैसे सच कहा जाए, तो 'मोदी कुर्ता' से किसी तरह का असाधारण सौंदर्य बोध नहीं होता। इसके बजाय यह एक मूल्य का प्रतीक है और इसी में इसका आकर्षण है।
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वॉग इंडिया की संपादक प्रिया तन्ना के अनुसार, 'हाल के समय में इससे पहले भारत के किसी नेता के विचारों और उनके पहनावे में इतनी मजबूत साम्यता नहीं देखी गई।' तन्ना इसके पक्ष में कुछ तर्क देती हैं-पहला तो यह कि मोदी की पसंद का कुर्ता देश की सौ फीसदी सांस्कृतिक छवि को रेखांकित करता है। दूसरा, यह लोकतांत्रिक है- कोई भी इस तरह की पोशाक पहन सकता है। तीसरी बात, यह स्थानीय उद्योग का समर्थन करता है। चौथी बात, यह उन्हें अपने राजनीतिक विरोधी राहुल गांधी से अलग करता है, जो अपनी पारिवारिक हैसियत के विपरीत खुद को लोगों से जुड़ा बताने के लिए साधारण सफेद कमीज पसंद करते हैं। पांचवीं बात, यह इस बात को भी रेखांकित करता है कि मोदी बहुत साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से आए हैं। उनके पिता चाय बेचते थे, लिहाजा उन्हें खुद को विनम्र दिखाने की जरूरत नहीं पड़ती।

इसके अलावा भी कुछ और है। छठी बात यह है कि मोदी हमेशा साफ और इस्तरी किया हुआ कुर्ता पहनते हैं। अक्सर उनका कुर्ता रंगीन होता है। वह नारंगी, हल्के नीले, पीतवर्णी और हरे कुर्ते में नजर आते हैं। इससे वह उन खांटी नेताओं से अलग दिखते हैं, जो पान चबाते दिख जाते हैं, जिनकी तोंद निकली होती है और जो सिलवट वाली धोती और बेरंग कुर्तों में नजर आते हैं। इससे उनके पेशेवराना अंदाज और व्यावसायिक जगत के प्रति रुझान का पता चलता है। सातवीं बात यह है कि जैविक सूत एवं सिल्क से बने कुर्ते, कलाई में अच्छी घड़ी (उनके पास एक मोवाडो घड़ी है) और बुलगारी के सनग्लास में वह एक ऐसे महत्वाकांक्षी शख्स की तरह नजर आते हैं, जिसके पहनावे में उसके देश और वहां के उद्योगों के प्रति उसके नजरिये की झलक मिलती है। और आठवीं बात, जैसा कि उनके दर्जी की कहानी से रेखांकित हुआ है, जिसने एक कपड़े की दुकान के बाहर मशीन लगाकर काम शुरू किया था और जो आज कपड़े की एक शृंखला का मालिक है और अपने प्रसिद्ध ग्राहक के कारण जिसकी खुद की एक हैसियत बन गई है।

जो लोग ऐसा सोचते हैं कि यह मोदी के कुर्ते का अतिरंजित वर्णन है, उन्हें याद रखना चाहिए कि मोदी की छवि का विकास तभी हुआ, जब उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक का काम छोड़ा और 1980 के दशक के आखिर में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। उसी समय वह कुर्ता बनवाने के लिए चौहान से मिले। चौहान की यह घोषणा मशहूर है, 'मोदी ने एक बार मुझसे कहा था कि तीन चीजों से वह कभी समझौता नहीं कर सकते, उनकी आंखें, उनकी जुबान और उनका कपड़ा।'

छवि निर्माण संबंधी ऐसी स्वीकारोक्ति अक्सर आधुनिक पंडितों को असहज करती है, खासकर पश्चिमी देशों में, जहां कुछ हद तक पोशाक संबंधी पसंद के पाखंडी प्रदर्शन का कोई मतलब नहीं है। निकोलस सरकोजी को देख लीजिए, जिन्हें ‘चमकीला राष्ट्रपति’ कहकर मजाक बनाया जाता था। निश्चय ही छवि गढ़ने की ऐसी कोशिशें विरोधियों को हमले का मौका देती हैं। समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने चुनाव प्रचार के दौरान मोदी का मजाक उड़ाते हुए कहा कि वह एक दिन में 500 कुर्ते बदलते हैं। लेकिन मोदी को कभी अपने पहनावे के प्रति ग्लानि नहीं हुई।

सवाल यह है कि अब जब उन्होंने सत्ता हासिल कर ली है, तो क्या उनकी शैली और संदेश बदल जाएंगे। मसलन, शपथ ग्रहण समारोह में मोदी ने आधी बांह वाले कुर्ते के बदले पूरी बांह का बटन वाला कुर्ता पहना था, जिससे ट्वीटर पर यह बहस छिड़ गई कि ज्यादा औपचारिक पहनावा सकारात्मक संकेत है या नहीं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मोदी ने इस बात को मजबूती से स्थापित किया है कि उनके पहनावे के कुछ खास मतलब हैं।
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