वैश्विक शोध कंपनी प्यू रिसर्च के अनुसार, आने वाले 40 वर्षों तक विश्व में सबसे अधिक श्रम शक्ति तथा आर्थिक विकास में सामूहिक उत्पादकता के मद्देनजर सर्वाधिक अंशदान देने वाला आयु समूह (25 से 65 वर्ष) पूरे विश्व में भारत का होगा। यह स्पष्ट करता है कि आने वाले समय में भारत आर्थिक विकास के मोर्चे पर बड़ी तेजी से अपनी बढ़त बनाएगा, क्योंकि तकरीबन 43 प्रतिशत आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की होगी तथा 50 प्रतिशत आबादी 25 वर्ष से लेकर 65 वर्ष की आयु समूह की होगी, और मात्र सात प्रतिशत आबादी 65 से अधिक वर्ष की रहेगी। यानी आगामी तीन-चार दशकों तक भारत में कमाने वालों की संख्या अधिक होगी तथा आश्रितों की संख्या कम होगी।
वहीं, अभी चीन में 65 वर्ष से अधिक की आबादी 14 प्रतिशत और अमेरिका में 18 प्रतिशत है तथा आगामी दशक तक यह 30 प्रतिशत के आसपास होने वाली है। रिपोर्टों के मुताबिक, चीन व अमेरिका, दोनों देशों में आर्थिक विकास के मद्देनजर जनसांख्यिकीय लाभांश का अनुपात आने वाले समय में बड़ी तेजी से गिरने वाला है, जबकि इस संदर्भ में भारत बड़ी मजबूती से वैश्विक पटल पर उभरेगा। भारत में औसत आयु 28 वर्ष है, जबकि चीन में यह 39 वर्ष तथा अमेरिका में 38 वर्ष है।
आने वाले समय में जब इस बात की आधिकारिक घोषणा होगी कि भारत विश्व की सर्वाधिक आबादी वाला मुल्क बन गया है, तो भारतीय समाज में उस पर गर्व नहीं किया जाएगा, बल्कि यह चिंता का सबब बनकर ही सामने आएगा। यह निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों और मध्यवर्गीय परिवारों के लिए परेशानियों की लकीरें खींचेगा।
इसकी वजह यह है कि आज भले ही भारत विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है, परंतु आर्थिक विकास की मुख्यधारा में समाज का एक बहुत बड़ा तबका शामिल नहीं है। आर्थिक विषमता आज भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी समस्या है, जिसका निदान आर्थिक नीतियों में कहीं नहीं दिख रहा है।
माना जा रहा है कि अर्थव्यवस्था की बागडोर परोक्ष रूप से निजी क्षेत्र के हाथों में रहने के कारण आने वाले समय में गरीबी और अमीरी की खाई बड़ी तेजी से बढ़ेगी। बेरोजगारी निरंतर समस्या बन गई है तथा इसका निदान नहीं हो रहा है।
प्रारंभिक स्तर पर विश्व की सर्वाधिक आबादी वाला मुल्क बनने पर जरूर हम चीन और अमेरिका (जो आर्थिक पायदान पर हमारी आगामी चुनौतियां हैं) से तुलनात्मक रूप से जनसांख्यिकीय लाभांश में आगे हैं। परंतु वास्तविकता यह भी है कि वैश्विक स्तर पर आज हमारी शैक्षणिक व्यवस्था विकसित रूप में नहीं दिखती है। भारत की वह युवा आबादी जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल नहीं कर पाई है, किस तरह से विकसित मुल्कों की तुलना में भारत का डंका बजा पाएगी, यह गहन सोच का विषय है।
जाहिर है, आर्थिक नीतियों में बदलाव तुरंत शुरू हो जाना चाहिए तथा इसे प्रारंभिक स्तर से ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उत्थान की तरफ केंद्रित करना चाहिए, ताकि समाज का पिछड़ा तबका जल्द से जल्द आर्थिक विकास की मुख्यधारा में जुड़ सके। अन्यथा आने वाले वर्षों में यह विशाल आबादी हमारी आर्थिक बदहाली का सूचक बन जाएगी।