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आगे बढ़ती हिंदी भारी पड़ती अंग्रेजी

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बीते दिनों एक साथ दो खबरें आईं। इनमें एक ‘द पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट है, जो बताती है कि हिंदी का मान बढ़ रहा है, लेकिन लोकभाषाओं में सिकुड़न जारी है। हिंदी के विषय में लिखा गया कि यह दुनिया की दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा का खिताब हासिल करने की तरफ बढ़ रही है।
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भाषा से संबंधित दूसरी खबर देश की उस संस्था द्वारा किए गए कुछ परिवर्तनों से जुड़ी है, जो अखिल भारतीय सेवाओं के लिए परीक्षा का आयोजन करती है। संघ लोक सेवा आयोग ने इस परिवर्तन के जरिये हिंदी सहित सभी क्षेत्रीय भाषाओं को ठिकाने लगाने का काम किया है।

क्या आयोग यह मानकर चल रहा है कि हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं में विषयों का संपूर्ण ज्ञान रखने वाले भारतीय युवा अखिल भारतीय सेवाओं के योग्य नहीं हैं? हिंदी की महत्ता क्या वहीं तक है, जहां तक सरकारी आवंटनों या व्ययों का विस्तार है?
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‘द पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट को देखने से इस पर इत्मीनान हो सकता है कि वैश्वीकरण के इस दौर में वर्चस्ववाद के लिए अंग्रेजी के तिकड़म या फिर वैश्वीकरण की आड़ में हो रहे सांस्कृतिक षड्यंत्र के बावजूद हिंदी न केवल अपना वजूद बचाए रही, बल्कि इसने अपना विस्तार भी किया है।

वही भाषा ज्यादा फलती-फूलती है, जो रोजगार की भाषा हो या जो भाग्यविधाता बने। यह दर्जा अंग्रेजी को ही मिला है। यह अनुचित बेशक नहीं, लेकिन यह विचार करने की जरूरत है कि देश के बाजारों में आखिर कौन-सी भाषा उत्पाद बेचने के काम आती है। श्रमिक, उपभोक्ता और खुदरा व्यापारी कौन-सी भाषा बोलते हैं?

टीवी से लेकर पत्र-पत्रिकाओं तक के विज्ञापनों में संभ्रांत सिने अभिनेता या खिलाड़ी किस भाषा में विज्ञापन कर सर्वाधिक धन अर्जित करते हैं? जाहिर है, हिंदी में। इसके बावजूद अंग्रेजी नियामक भाषा बनी हुई है, तो इसके लिए दोषी कौन है?

संघ लोक सेवा आयोग ने सिविल सेवा मुख्य परीक्षा के लिए नए परिवर्तित पाठ्यक्रम में अंग्रेजी का ज्ञान तो अनिवार्य बना दिया, लेकिन यह आवश्यकता नहीं समझी कि आईएएस अधिकारियों को हिंदी या अपनी लोकभाषाओं/क्षेत्रीय भाषाओं का ज्ञान हो।

ये आईएएस अधिकारी किन लोगों के बीच में काम करने के लिए तैयार किए जा रहे हैं? वे जिस राजनीतिक व्यवस्था के अधीन काम करेंगे, वे कौन होंगे? जाहिर है, ये दोनों ही अंग्रेजी भाषी वर्ग नहीं हैं। फिर आयोग ने सिविल सेवा मुख्य परीक्षा के बदले पाठ्यक्रम में हिंदी या लोकभाषाओं को स्थान क्यों नहीं दिया?

उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष तक इस परीक्षा में कुल नौ प्रश्नपत्र में एक हिंदी एवं अंग्रेजी का प्रश्नपत्र भी होता था। हिंदी और अंग्रेजी के अंक पूर्णांक में जुड़ते नहीं थे, बल्कि प्रतिभागियों को इनमें निर्धारित अंक सीमा पार करनी होती थी। गैर हिंदी भाषी राज्यों के विद्यार्थियों के लिए यह सुविधा थी कि वे हिंदी के स्थान पर क्षेत्रीय भाषा का चुनाव कर सकते थे।

लेकिन नए पाठ्यक्रम में हिंदी को जगह नहीं दी गई और अंग्रेजी को अनिवार्य बना दिया गया है, जिसके अंक (100) अब पूर्णांक में जुड़कर परिणाम को खासा प्रभावित करेंगे। यानी अंग्रेजी का ज्ञान न रखने वालों के सफल होने की संभावना बहुत कम रह जाएगी। चूंकि हिंदी हटी, इसलिए उसके विकल्प में ली जाने वाली क्षेत्रीय भाषाओं को भी जमींदोज होना पड़ा।

पाठ्यक्रम में इस तरह का बदलाव करके संघ लोक सेवा आयोग शायद यह बताना चाह रहा है कि ग्रामीण भारत के लोग अपने देश की प्रशासनिक सेवाओं के योग्य नहीं हैं। या फिर वह यह बताना चाहता है कि सिविल सेवकों की भाषा भी वही होनी चाहिए, जो सेल्समैन की।

फिलहाल हिंद-यूरोपीय, हिंद-ईरानी, हिंद-आर्य जैसे भाषायी परिवार और जुबान-ए-हिंदवी, सबक-ए-हिंदी, रेखता और उर्दू जैसे समागमों से गुजरती हुई हिंदी आज लगभग 50 करोड़ लोगों द्वारा अपनी प्रथम या आरंभिक जुबान के रूप में प्रयुक्त होती है, जबकि दूसरी जुबान के रूप में लगभग 20 से 25 करोड़ लोगों द्वारा। इसलिए जब इसका तिरस्कार संघ लोक सेवा आयोग जैसी सांविधानिक संस्थाओं द्वारा होता है, तो यह मात्र भाषा का प्रश्न नहीं रह जाता, अस्तित्व का भी प्रश्न बन जाता है।
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