धर्मग्रंथों और नीतिशास्त्रों में यह बताया गया है कि हर जीव-जंतु में ईश्वर के दर्शन करने चाहिए। दीन-दुखियों, रोगियों तक में प्रभु के दर्शन करना चाहिए। यहां तक कि हर कण में ईश्वर का निवास है, और जो व्यक्ति इस मूल को समझ लेता है, वह स्वतः ईश्वर के साक्षात्कार का अधिकारी हो जाता है।
एक बार रामकृष्ण परमहंस मां काली के विग्रह को भोग लगाने के लिए दूध तथा मिष्ठान्न लेकर मंदिर में पहुंचे। उन्होंने देखा कि एक बिल्ली मंदिर के आंगन में पड़ी भूख से बिलबिला रही है। उन्होंने काली मां के लिए तैयार किया गया प्रसाद दूध से भरा कटोरा बिल्ली के सामने रख दिया तथा हाथ जोड़कर बोले, लो दूध का भोग लगाओ, मां।
मंदिर के अधिकारी ने यह दृश्य देखा, तो वह नाराज होकर बोला, महाराज, आपने यह क्या किया? काली मां के लिए लाया गया दूध बिल्ली को पिला दिया। इससे प्रसाद अपवित्र हो गया।
परमहंस जी ने उत्तर दिया, भैया, मुझे तो प्रत्येक प्राणी में काली मां के दर्शन होते हैं। जब भूखी बिल्ली दूध पी रही थी, तो मुझे लग रहा था कि मां काली मुझे मुस्कराकर आशीर्वाद दे रही हैं। यह सुनकर मंदिर का अधिकारी शर्मिंदा हो गया।
तो कुछ ऐसे ही संत थे, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, जो किसी के भी दुख को देखकर द्रवित हो उठते थे और उसकी सेवा के लिए सदैव तत्पर रहते थे।