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उनकी बातें...बातें...और हमारी

Thu, 09 Oct 2014 06:52 PM IST
प्रकाश पुरोहित
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एक सर्वे में सामने आया कि महिलाएं चार से पांच घंटे गप्प लड़ाती हैं। इसी पर हैरान हो चार पुरुष बात कर रहे हैं।
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चार से पांच घंटे...यह कुछ ज्यादा नहीं है?

यह कम ही है। काम न हों, पति का डर न हो, तो जितने कहो, उतने घंटे गप्पबाजी कर लें।

आम तौर पर महिलाएं अखबार भी नहीं पढ़तीं। राजनीति की भी समझ नहीं होती, फिर चार-पांच घंटे किस विषय पर बात करती होंगी?

विषय कम हैं क्या! एक सीरियल को ही लेकर बैठें, तो पांच घंटे कम पड़ जाएं।

लेकिन यह तो कोई गप्पबाजी नहीं हुई?

सीरियल की बात कौन करता है? सीरियल की घटनाओं को आसपास वालों से जोड़ा जाता है और नई पटकथा तैयार हो जाती है।

इन्हें बातों की चिंदी पकड़ा दो, तो गप्पों का थान तैयार कर दें। हम अपने विषय में विचार और सोच शामिल करते हैं, इसलिए लंबा नहीं खींच सकते। मगर इन महिलाओं को तो बात का रबड़ बनाने में ही मजा आता है।

ये एक जैसी बात करते हुए बोर नहीं होतीं? मुझे तो लगता है, महिलाएं इसी वजह से पिछड़ी हैं। इतना वक्त दूसरे काम में लगाएं, तो तैंतीस फीसदी रिजर्वेशन की जरूरत न पड़े।
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पढ़ने-लिखने में इनकी दिलचस्पी नहीं रहती। ये न अपना कर्तव्य जानती हैं, न ही अधिकार।

ऐसा नहीं है कि घरेलू महिलाएं ही ऐसी होती हैं। बाहर काम करने वाली भी इतने ही घंटे गप्प लड़ाती हैं, इसीलिए तो पुरुषों को उनका काम करना पड़ जाता है। बल्कि कुछ मर्दों का तो काम ही यह हो जाता है कि साथी महिलाओं के अधूरे काम निपटाते रहो।

इतना बोलते हुए इनका मुंह दर्द नहीं करता होगा?

बोलना ही तो इनकी ताकत है। वह चुटकुला है न कि दो महिलाएं बैठी थीं और चुप थीं।

अरे, पांच बज गए। पता ही नहीं चला। इन महिलाओं की बातें ही ऐसी होती हैं।...पूरे चार घंटे हो गए।

चलो...चलें! ऑफिस टाइम हो गया। और सभी चल दिए।
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