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देव आनंद की रोमांटिक आवाज थे हेमंत कुमार

सुब्रत मुखर्जी एवं सुशीला रामास्वामी Published by: सुशीला रामास्वामी Updated Sun, 21 Jun 2020 04:52 AM IST
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dev anand - फोटो : social media

वर्ष 1958 में आई फिल्म सोलवां साल की नायिका वहीदा रहमान फिल्म के नायक देव आनंद से कहती हैं कि यदि तुम्हारे मां-बाप ने तुम्हारा नाम हेमंत कुमार रखा होता, तो यह अच्छा होता। फिल्म के आखिर में देव आनंद उत्साह के साथ कहते हैं, 'कुछ लोग सोचते हैं कि मेरा नाम हेमंत कुमार होना चाहिए।' वहीदा रहमान की शुरुआती टिप्पणी और देव आनंद के ये शब्द उस गायक के प्रति जताया गया सच्चा सम्मान था, जो कि 1950 के दशक में हिंदी फिल्मों में देव आनंद की रोमांटिक आवाज बने रहे, ठीक वैसे ही जैसे वह बांग्ला फिल्मों में उत्तम कुमार की रोमांटिक आवाज थे। खुद हेमंत कुमार व्यक्तिगत तौर पर मानते थे कि मोहम्मद रफी और किशोर कुमार से पहले वह देव आनंद की रोमांटिक आवाज थे।



हेमंत मुखर्जी, जिन्हें फिल्मी दुनिया में हेमंत कुमार के नाम से जाना गया, सौ साल पहले 16 जून 1920 को पैदा हुए थे। उनकी आवाज मध्यम सुर की थी और वह स्कूलों में गाने गाकर अपने दोस्तों का मनोरंजन किया करते थे। शुरू में उनका झुकाव लेखन की ओर था। उनके बचपन के दोस्त सुभाष मुखोपाध्याय जोकि खुद एक जाने माने कवि थे, उन्होंने कभी याद किया था कि बचपन में किसी को अंदाजा नहीं था कि हेमंत महान गायक बनेंगे। दरअसल हेमंत लेखक के तौर पर स्थापित हो रहे थे और उनकी कुछ कहानियां देश और आनंद बाजार पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी थी।


1936 में उन्हें ऑल इंडिया रेडियो में पहली बार इस शर्त के साथ गाने का मौका मिला कि वह जो गाना गाएंगे, उसका कॉपीराइट न हो। इससे बड़ी मुश्किल हुई क्योंकि वह अक्सर पंकज कुमार मल्लिक और सचिन देव बर्मन के गीत उनकी नकल करते हुए गाते थे। हेमंत ने एक लोकगीत गाकर इस मुश्किल से निजात पाई जो कि काफी लोकप्रिय हुआ। मगर इससे लेखक बनने के उनके इरादे पर फर्क नहीं पड़ा। उस समय तक वह स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद जादवपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला ले चुके थे।


हेमंत उनके घर के पास स्थित कल्याण संघ लाइब्रेरी के सदस्य बन चुके थे। उनके करीबी दोस्त रामकृष्ण मैइत्रा एक हस्तलिखित पत्रिका के संपादक थे। दोनों दोस्त इसमें छोटी कहानियां लिखते थे और सुभाष कभी-कभार इस पत्रिका के लिए कविताएं लिख दिया करते थे। इस बीच, हेमंत रेडियो पर गाने गाते रहे पर नियमित नहीं। उन्हें पहली बार बड़ी प्रशंसा तब मिली जब एक बार रेडियो स्टेशन में संगीत सम्राज्ञ पंकज मल्लिक से उनकी मुलाकात हुई।


इसके बाद हेमंत को एहसास हुआ कि रेडियो में गाना गाना ही पर्याप्त नहीं है और उन्हें अपने गानों का रिकॉर्ड तैयार करवाना चाहिए। शुरुआती विफलताओं के बाद कोलंबिया रिकॉर्ड्स उनका एक एलबम लाने का तैयार हो गया। कॉलेज से निकलने के बाद उन्होंने अपनी सारी ऊर्जी संगीत को समर्पित कर दी। हेमंत ने पंकज मल्लिक और एस डी बर्मन की छाया से निकलते हुए अपनी विशिष्ट शैली ईजाद की। वह गीतकार और संगीत निर्देशक दोनों थे और उन्होंने बांग्ला और हिंदी फिल्मों के गीत गाए जो काफी मशहूर हुए। रवींद्रनाथ टैगोर के निधन पर उन्होंने चर्चित गीत, जोखोन पोड़बे ना मोर पायेर चिह्नो गाया। वह अपने कपड़ों को लेकर खासे सजग रहते थे और हमेशा पारंपरिक सफेद कमीज और धोती पहनते थे, काले फ्रेम का चश्मा लगाते थे। बाद के वर्षों में उन्होंने अपने बाल रंगना भी शुरू कर दिया था। इसके पीछे उनका तर्क था कि युवा सफेद बाल वाले गायक से रोमांटिक गीत क्यों सुनना पसंद करेंगे।


हेमंत कुमार 1944 में भारतीय नाट्य संगठन (इप्टा) से जुड़ गए थे। इसकी वजह थी बंगाल का अकाल जिसमें साठ लाख लोगों की भूख से मौत हो गई थी। उन्होंने बंगाल और असम के देहातों की यात्रा कर राष्ट्रवादी गीतों को लोकप्रिय बनाया और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की समझ विकसित की। उस समय इप्टा में ख्वाजा अहमद अब्बास, कैफी आजमी, चेतन आनंद, देव आनंद, मुल्कराज आनंद, होमी भाभा, अनिल विश्वास, सलिल चौधरी, इस्मत चुगतई, ऋत्विक घटक और पंडित रविशंकर जैसे लोग सक्रिय थे।


बंगाल में एक गायक और संगीतकार के रूप में स्थापित होने के बाद हेमंत कुमार 1940 के दशक में मुंबई आ गए और वहां उन्होंने निर्देशक के रूप में हेमेन गुप्ता की पहली हिंदी फिल्म आनंद मठ (1952) का संगीत दिया। लता मंगेशकर के साथ उनका गाया गीत वंदे मातरम् रफी चर्चित हुआ। उन्होंने करीब पचास हिंदी फिल्मों के लिए संगीत दिया, जिनमें जागृति, बीस साल बाद, साहिब बीवी और गुलाम, कोहरा, अनुपमा और खामोशी प्रमुख हैं। 1960 के दशक में उन्होंने अपना प्रोडक्शन हाउस बनाकर फिल्मों का निर्माण भी किया, जिनमें बीस साल बाद, कोहरा, बीवी और मकान, फरार तथा खामोशी प्रमुख हैं। हालांकि इनमें बीस साल बाद और खामोशी ही व्यावसायिक रूप से सफल हुईं।
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हेमंत कुमार ने एस डी बर्मन के लिए 13 गाने गए जिनमें से 12 को देव आनंद पर फिल्माया गया। सोलवां साल का सबसे चर्चित गाना, है अपना दिल तो आवारा, अपने हर्ष और अवसाद दोनों ही रूपों में 1958 में पूरे साल बिनाका गीत माला में शीर्ष पर बना रहा। देव आनंद के लिए जाल फिल्म के लिए गाया गया उनका गीत, ये रात ये चांदनी फिर कहां... सात दशक बाद आज भी इतना लोकप्रिय है कि यूट्यूब में इसके 1.4 करोड़ व्यूव हो चुके हैं।


हेमंत कुमार ने किशोर कुमार के गाए गीतों के लिए पश्चिमी धुनों का इस्तेमाल किया। वह मानते थे कि जब दुनिया वाकई बहुत छोटी हो चुकी है, तो जो अपने समय में सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध है, उसका इस्तेमाल किया जाए। उनके इसी दर्शन ने उन्हें बांग्ला संगीत के साथ ही हिंदी फिल्म संगीत में अमर कर दिया।

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