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गलवां में क्या हुआ

पी. चिदंबरम
Updated Sun, 21 Jun 2020 04:49 AM IST
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गलवां घाटी

क्या भारत और चीन एक नए और विवादास्पद युग की शुरुआत की ओर बढ़ रहे हैं? ऐसा लगता तो है। पहले अध्याय में, चीनी सैनिक चुपचाप भारतीय क्षेत्र में कुछ किलोमीटर तक घुस आए, वह भी बिना नजर में आए, और गलवां घाटी, हॉट स्प्रिंग और पैगोंग त्सो में कुछ महत्वपूर्ण पॉइंट्स पर कब्जा कर लिया। पांच और छह मई के दौरान हुई झड़प से घुसपैठ का पता चला। अध्याय दो में, 15-16 जून की रात को चीनी बल भारतीय बलों से भिड़ गए जिसमें भारतीय पक्ष के 20 जवान मारे गए; 80 सैनिक घायल हो गए और दस को बंदी बनाया गया और उन्हें 18 जून को रिहा किया गया।



भारत-चीन सीमा- या कहें वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी)- 1962 के युद्ध के बाद से उबल रही है, लेकिन 1975 के बाद यह पहला मौका है, जब यहां जानें गई हैं। पैंतालीस वर्षों तक शांति कायम रहना कोई मामूली उपलब्धि नहीं है। मोदी की निगरानी में यह मामूली-सी शांति ध्वस्त हो गई है। 


एक झूठी कथा

मोदी सरकार ने पिछले छह सालों से जो कथा बुनी है, वह पूरी तरह से झूठी है। श्री नरेंद्र मोदी, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री चीन के पसंदीदा रहे हैं, चार अवसरों पर जिसने उनकी मेजबानी की; श्री मोदी किसी भी अन्य प्रधानमंत्री के उलट पांच बार चीन गए और उन्होंने दोनों देशों के विशेष रिश्ते को रेखांकित किया; और श्री मोदी तथा श्री शी के बीच विशेष केमेस्ट्री है, जैसा कि वुहान (2018) और महाबलीपुरम (2019) में रेखांकित हुआ था, यह सब इसी झूठी कथा का हिस्सा थे। यह बुलबुला 15-16 जून को फट गया।


खूनी टकराव और मौतों के बाद भारत शांत बना हुआ है। विदेश मंत्रालय ने एक कमजोर-सा बयान जारी किया, जिसमें लिखा था, '...चीनी पक्ष द्वारा एकतरफा तरीके से यथास्थिति को बदलने के प्रयास के कारण हिंसक झड़प हुई...भारत की सारी गतिविधियां एलएसी के उसके अपने हिस्से तक सीमित थीं और वह चीन से भी ऐसी ही उम्मीद करता है।' चीन का जवाब त्वरित और आक्रामक था। पीएलए ने कहा, 'गलवां घाटी क्षेत्र की संप्रभुता हमेशा से चीन के अधीन रही है' और चीनी विदेश मंत्री ने यह कहते हुए भारत को झिड़का कि, 'भड़काने वाली सारी कार्रवाइयां बंद कीजिए...। क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने की चीन की दृढ़ इच्छाशक्ति को भारतीय पक्ष कम करके न आंके।'


खुफिया नाकामी

इस साल मई में चीन ने जिस तरह से काम किया उसे लेकर कई कथाएं हैं। जिस पैमाने पर घुसपैठ हुई है, वह सावधानी के साथ की गई कई महीने की तैयारी को दिखाती है- हो सकता है अगस्त, 2019 से यह तैयारी चल रही हो जब मोदी सरकार ने जम्मू और कश्मीर के सांविधानिक दर्जे में बदलाव किया था। सरकार ने इस तथ्य को नजरंदाज कर दिया या उसे परे हटा दिया (इसकी संभावना ही अधिक दिखती है) कि चीन ने लद्दाख के बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया है और उस पर संप्रभुता का दावा करता है; वह बेल्ट ऐंड रोड के जरिये पाकिस्तान को गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर जोड़ना चाहता है, जो कि लद्दाख का एक हिस्सा है; उसने एलएसी में भारतीय हिस्से में डीबीए रोड से जोड़ने के लिए भारत द्वारा किए गए सड़क निर्माण को लेकर आपत्ति जताई थी। चीन ने गृह मंत्री के इस बयान पर भी गौर किया होगा कि अक्साई चिन भारत का हिस्सा होगा।


यह एक गंभीर सोच है कि भारत को चीन के इरादों पर संदेह नहीं था। यदि भारत की शालीनता के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, तो वे हैं हमारी बाहरी खुफिया एजेंसियों के साथ ही प्रतिरक्षा खुफिया एजेंसियां जिनकी लद्दाख में तैनाती है। एक तरह से यह कारगिल की अक्षम्य पुनरावृत्ति है और खासतौर से सैटेलाइट और अंतरिक्ष से लगातार तस्वीरें मिलने वाले युग में यह पहेली है।  कारगिल और गलवां घाटी में फर्क यह है कि इस बार दुश्मन अनाड़ी पाकिस्तान नहीं, बल्कि कुटिल चीन है।


2013 में देपसांग में भारत ने चीन को सबक सिखाया था और चीन वहां से पूरी तरह से हट गया था। दोकलम (भूटान, 2017) में चीन ने भारत की ताकत और कमजोरियों के बारे में एक कीमती सबक सीखा था। भारत ने इस त्रिकोणीय क्षेत्र से कुछ चीनी बलों की वापसी का जश्न मनाया था, लेकिन दोकलम के पठार में चीन द्वारा किए गए निर्माण को नरमी के साथ मौन स्वीकृति दे दी। जबकि दोकलम के पठार में अब भी चीनी मौजूद हैं! 
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श्री मोदी की गलती

चीनी दोकलम का सबक गलवां घाटी में आजमा रहे हैं और वे इसे अंततः पैंगोग त्सो तथा फिंगर चार (चीन के मुताबिक एलएसी) और फिंगर आठ (भारत के मुताबिक एलएसी) में भी आजमाएंगे। गलवां घाटी में हुए नुकसान से बचने का एक अवसर था। छह जून को कोर कमांडरों की बैठक के तुरंत बाद श्री मोदी को श्री शी को फोन करना चाहिए था और उन्हें बातचीत से निकले निष्कर्ष के आधार पर एक संयुक्त बयान जारी करवाना था, जिस पर दोनों पक्षों की सहमति हो। इससे संभवतः 15-16 जून को जो त्रासदी हुई वह घटित नहीं होती। श्री मोदी की ओर से यह गंभीर गलती हुई है।


श्री मोदी का यह सपना कि 21 वीं सदी चीन-भारत की अगुआई में एशिया की सदी होगी, खत्म हो चुका है। यह स्वाभाविक है कि श्री मोदी श्री शी को ठीक से नहीं आंक पाए। क्या श्री शी ने श्री मोदी को ठीक से आंका है, यह मनन का करने का विषय है। ये दोनों नेता फिर कभी करीबी दोस्त नहीं बन सकते। वे अब भी कारोबार कर सकते हैं और कदम दर कदम समझौतों पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, जैसा कि श्री नरसिंह राव, श्री वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह ने चीन के अपने समकक्षों के साथ किया था और 4,056 किलोमीटर लंबी सीमा पर शांति कायम कर सकते हैं, जिसमें एलएसी भी शामिल है।


यह तय है कि अब कोई और 'शिखर बैठक' या 'झूला झूलने वाला काम' नहीं होगा। अब सिर्फ यथार्थवादी बातचीत होगी। श्री मोदी के लिए दो हजार साल पहले संत तिरुवल्लवुर की कही यह बात उपयोगी होंगी, 'नियति की ताकत, अपनी खुद की ताकत, विरोधी की ताकत, सहयोगियों की ताकत, इन सबका आकलन करना चाहिए और उसके आधार पर आपको अपनी आगे की कार्रवाई तय करनी चाहिए।'  (कुराल, 471)

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