जल्दी ही दुनिया एक उल्लेखनीय क्षण का गवाह बनेगी, जब लोगों की चहेती और नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित महिला 21वीं सदी के बंदी शिविरों से भरे एक देश का नेतृत्व करेंगी। आंग सान सू की को म्यांमार में लोकतंत्र स्थापित करने में सफलता मिल गई है। पिछले साल के चुनाव में उनकी पार्टी को भारी बहुमत मिला है। पर इस जीत के साथ सू की को रोहिंग्या मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ नस्लीय भेदभाव की विरासत भी मिल रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, म्यांमार के रोहिंग्या मुस्लिम विश्व के सबसे अधिक पीड़ित अल्पसंख्यक हैं। येल विश्वविद्यालय के एक हालिया अध्ययन के अनुसार, म्यांमार की करीब 10 लाख रोहिंग्या मुसलमानों की आबादी लगातार उत्पीड़न एवं नरसंहार का खतरा झेल रही है। लेकिन सू की भेदभाव भरी इस नीति को बरकरार रखने की पक्षधर जान पड़ती हैं। अब चूंकि वह सत्ता-राजनीति में हैं, ऐसे में, रोहिंग्या जैसे अल्पसंख्यक समुदाय का दमन अधिकांश बौद्ध मतदाताओं के लिए सुखद है।
एक दूसरे नोबल पुरस्कार विजेता अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी, जिनका म्यांमार पर खासा दखल है और जो दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने के बाद दो बार वहां का दौरा कर चुके हैं, म्यांमार के प्रति बहुत रुचि नहीं दिखा रहे। म्यांमार लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर मुड़ा है, तो इसके पीछे बराक ओबामा और हिलेरी क्लिंटन का बड़ा योगदान है। पर 67 से अधिक बंदी शिविरों में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों की हकीकत उनकी इन उपलब्धियों पर पानी फेर देती है।
रोहिंग्या होने के कारण ही मोहम्मद करीम को चौदह साल की उम्र में अपनी जान गंवानी पड़ी। मोहम्मद एक बंदी शिविर में हजारों दूसरे रोहिंग्या मुसलमानों के साथ रहता था। इन लोगों की न सिर्फ नागरिकता छीन ली गई, बल्कि इनके इधर-उधर निकलने पर रोक लगा दी गई थी। मोहम्मद करीम मलयेशिया भाग जाना चाहता था। लेकिन उसकी मां यह नहीं चाहती थी। कुछ दिन बाद मोहम्मद की एड़ी में खरोंच लगी। किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया, और फिर मोहम्मद के लिए अपना जबड़ा खोलना भी कठिन हो गया। उसे टिटनेस हो गया था, पर उसे टिटनेस का एक इंजेक्शन तक नसीब नहीं हुआ। मोहम्मद को अस्पताल ले जाने के लिए जब तक उसकी मां को विशेष अनुमति मिलती, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। दो दिन बाद उसका मृत शरीर वापस आया।
मोहम्मद की झोपड़ी से करीब 100 फीट दूर हेपेटाइटिस-ए से पीड़ित 20 वर्षीय महिला बिल्दर बेगम की मौत हो गई। हेपेटाइटिस-ए को आमतौर पर जानलेवा बीमारी नहीं माना जाता, इसके बावजूद जरूरी चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में उसकी मौत हो गई। रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय के नेता एनुस मोनीर के मुताबिक, 'बिल्दर अगर रोहिंग्या समुदाय की नहीं होती, तो आज वह जिंदा होती।' बिल्दर बेगम का 28 महीने का बेटा हिरोल अब कुपोषण और भुखमरी का शिकार है।
कुछ मील की दूरी पर स्थित बैंक में शिविरों में रहने वाले कुछ परिवारों के खाते हैं, जहां उनकी थोड़ी-बहुत जमा-पूंजी है। लेकिन, वर्ष 2012 से बंदी शिविरों में कैद होने के कारण परिवार पालने के लिए वे अपना पैसा निकालने भी नहीं जा सकते। रोहिंग्या मुसलमानों की दुर्दशा पर वैश्विक समुदाय भी उदासीन है। बंदी शिविरों में रह रहे रोहिंग्या लोगों तक पत्रकारों और सहायता समूहों की पहुंच आसान नहीं है। इसलिए उनकी पीड़ा के बारे में बाहर बहुत जानकारी नहीं आ पाती है।
संयुक्त राष्ट्र भी म्यांमार में निष्क्रिय है। ऐसे में वहां मानवता के खिलाफ हो रहे अपराधों के लिए संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर भी सवाल खड़ा होता है। 'ह्यूमन राइट्स वॉच' और 'फोर्टिफाई राइट्स ऐंड यूनाइटेड टू ऐंड जेनोसाइड' जैसे मानवाधिकार संगठनों की तारीफ करनी होगी, जिन्होंने म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों की बदहाली उजागर की है।
म्यांमार सरकार रोहिंग्या लोगों के अस्तित्व तक को नकारने की कोशिश कर रही है। स्थानीय प्रशासन ‘रोहिंग्या’ शब्द का इस्तेमाल ही नहीं करता, उसके लिए ये लोग अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। जबकि यह असंगत तथ्य है; ऐतिहासिक दस्तावेजों में रोहिंग्या समुदाय का जिक्र है। विगत नवंबर में पांच लोगों को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया था, क्योंकि उन्होंने रोहिंग्या को एक नस्लीय समूह के रूप में प्रदर्शित करने वाला नए साल का एक कैलेंडर छाप दिया था। सू की भी रोहिंग्या शब्द से परहेज करती हैं। म्यांमार में अमेरिकी दूतावास के अधिकारी भी इस शब्द के इस्तेमाल से कतराते हैं।
'फोर्टिफाई राइट्स ऐंड यूनाइटेड टू ऐंड जेनोसाइड' से जुड़े मैथ्यू स्मिथ की मानें, तो ओबामा प्रशासन इस मामले में बहुत कुछ कर सकता है। इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मामले की पड़ताल से लेकर रोहिंग्या लोगों की मुक्ति और उन्हें नागरिकता देने के अलावा पीड़ितों तक सहायता समूहों की पहुंच सुनिश्चित करने जैसे कदम शामिल हैं। हालांकि अमेरिका के दूसरे राजनीतिज्ञों ने इस मामले पर चुप्पी साध रखी है और राष्ट्रपति चुनाव में भी यह मुद्दा बमुश्किल ही देखने को मिलता है।
म्यांमार में लोकतंत्र को मजबूती तो मिली, पर भेदभाव की राजनीति करने वालों का दखल बढ़ने से रोहिंग्या समुदाय की बेहतरी की उम्मीद कम है। हाल के चुनाव में आंग सान सू की की पार्टी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को चुनाव में खड़ा नहीं होने दिया। म्यांमार की जनता सू की को रोहिंग्या लोगों का हमदर्द मानती है, क्योंकि वह शरणार्थियों पर टिप्पणी करने के बजाय चुप रहती हैं। पर सू की के प्रशंसकों को रोहिंग्या समुदाय पर उनकी चुप्पी खल रही है।