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आतंक के मददगार

सलमान हैदर Published by: Raman Singh Updated Fri, 15 Mar 2019 08:24 PM IST
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मसूद अजहर

चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आतंकवादी संगठन जैश-ए मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव पर तकनीकी रोक लगा दी है। यह पहली बार नहीं है, इससे पहले भी तीन बार चीन ने मसूद अजहर को बचाने के लिए ऐसा किया है। दरअसल इस तकनीकी रोक का मतलब है कि उसने इस प्रस्ताव को फिलहाल टाल दिया है, हालांकि उसने यह कहा है कि उसे इस मुद्दे को समझने के लिए और वक्त चाहिए। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि वह इस मुद्दे पर और क्या अध्ययन करना चाहता है, जबकि मसूद अजहर का संगठन जैश-ए मोहम्मद वर्ष 2001 से ही संयुक्त राष्ट्र की आतंकवादी सूची में शामिल है। पूरी दुनिया को पता है कि जैश-ए मोहम्मद की स्थापना मसूद अजहर ने ही की थी और कई आतंकवादी घटनाओं में उसकी संलिप्तता रही है। ऐसे में अब समझने और समझाने के लिए बचा ही क्या है, जिसके लिए उसने फिलहाल इस प्रस्ताव पर तकनीकी रोक लगा दी है? साफ है कि चीन पाकिस्तान के कारण मसूद अजहर को बचाना चाहता है और उसने बहाने से इस प्रस्ताव पर रोक लगाई है। इसके पहले भी अमेरिका ने चीन को चेतावनी दी थी कि उसका रुख क्षेत्रीय स्थिरता और शांति के लिए खतरा हो सकता है।



चीन के ऐसा करने से जाहिर है, पुलवामा हमले के बाद आतंकवाद के खिलाफ भारत के कूटनीतिक प्रयासों को झटका लगा है, लेकिन इससे निराश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मसूद अजहर के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव को अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने अपनी सहमति दी है। यही नहीं, विगत 14 फरवरी को जब सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकवादी हमले हुए, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उसे 'जघन्य और कायरतापूर्ण' हमला बताया था और जिस बैठक में यह बयान दिया गया, उसमें चीन भी शामिल था। फिर 26 फरवरी को जब भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों पर हवाई हमले किए, तो दुनिया के तमाम शक्तिशाली देशों ने उसका समर्थन किया और कहा कि अपनी आत्मरक्षा में भारत को ऐसा कदम उठाने का हक है।


यही नहीं, चीन के इस ताजा करतूत पर भी अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने सवाल उठाए हैं और चीन की आलोचना की है। फ्रांस ने तो यहां तक घोषणा की है कि वह मसूद अजहर की संपत्ति जब्त कर लेगा। तो कहने का तात्पर्य यह है कि बेशक मसूद अजहर को इस बार वैश्विक आतंकवादी घोषित करने की हमारी उम्मीद पूरी नहीं हुई, लेकिन आतंकवाद के खिलाफ हमारे रुख को व्यापक समर्थन मिल रहा है। चीन के रवैये से नाराज संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने चेतावनी दी कि यदि चीन अपनी इस नीति पर अड़ा रहा तो जिम्मेदार सदस्य परिषद में ‘अन्य कदम उठाने पर मजबूर’ हो सकते हैं। अगर यह प्रस्ताव पारित हो जाता, तो न केवल मसूद अजहर की संपत्ति जब्त कर ली जाती, बल्कि उसके कहीं आने-जाने पर भी पाबंदी लग जाती। खैर, हम मंजिल पर अभी नहीं पहुंच पाए हैं, पर हम सही रास्ते पर हैं और हमें अपनी कोशिश लगातार जारी रखनी चाहिए। भारत को अपने कूटनीतिक प्रयास लगातार जारी रखने चाहिए और आतंकवाद व आतंकी को बचाने वाले देशों को बेनकाब करते रहना चाहिए।


जहां तक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ढांचे में बदलाव या सुधार की बात है, तो इसका फिलहाल कोई संकेत मुझे नहीं दिख रहा है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ढांचे में सुधार की बात लंबे अरसे से चल रही है। भारत भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनना चाहता है, जिस पर कई देशों ने समर्थन देने के लिए सहमति भी जताई है, लेकिन अब तक हम वह हक हासिल नहीं कर पाए हैं। चीन चूंकि सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है, इसलिए उसे वीटो का अधिकार प्राप्त है। अगर सुरक्षा परिषद का कोई स्थायी सदस्य किसी प्रस्ताव पर वीटो लगा देता है, तो वह प्रस्ताव पारित नहीं होता है। बेशक चीन का रुख मसूद अजहर के मामले में नकारात्मक रहा है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि सिर्फ इसी मामले को लेकर सुरक्षा परिषद के ढांचे में बदलाव की बात आगे बढ़ सकती है।


चीन के इस रुख से इसलिए भी हमें निराशा हुई है, क्योंकि पुलवामा हमले के बाद चीन से जो संकेत मिल रहे थे, उनसे लग रहा था कि इस बार वह आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के साथ खड़ा होगा। लेकिन अंततः इस बार भी उसने पाकिस्तान का ही साथ दिया। पाकिस्तान के आतंकवादियों के प्रति उसकी नरमी का मुख्य कारण चीन का रणनीतिक दृष्टिकोण है। उसने पाकिस्तान को अपना सदाबहार मित्र चुना हुआ है, क्योंकि उसने पाकिस्तान में काफी निवेश किया हुआ है। निर्माणाधीन चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे में चीन ने भारी निवेश किया है, इसलिए वह अपने मित्र पाकिस्तान को नाराज नहीं करना चाहता है। इसके अलावा चीन को लगता है कि अगर वह अफगान-पाकिस्तानी क्षेत्र के आतंकियों की मदद करता है, तो वे शिनझियांग प्रांत में उइघुर अलगाववादियों को समर्थन देना बंद कर देंगे।


चीन और पाकिस्तान के बीच जो यह दोस्ती है, उसे कूटनीतिक प्रयासों से ही कमजोर किया जा सकता है। भारत को इन दोनों देशों से निपटने के लिए अपने कूटनीतिक प्रयासों को और तेज करना चाहिए। एक तरफ जहां हमें आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई को कमजोर नहीं होने देना है, वहीं अपने आर्थिक हितों का भी ध्यान रखना है। चीन हमारा बड़ा कारोबारी साझेदार है। इसलिए हमें काफी सावधानीपूर्वक कदम उठाना होगा, जिससे न तो हमारे आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचे और न ही आतंकवाद के खिलाफ हमारे रुख मे नरमी दिखाई दे। मसूद अजहर के मामले में चीन के इस रवैये के खिलाफ देश भर में तीखी प्रतिक्रिया हुई है और लोग चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की मांग कर रहे हैं। लोगों की भावनाएं अपनी जगह सही हैं, लेकिन सिर्फ किसी एक मुद्दे पर द्विपक्षीय रिश्तों में फैसला नहीं किया जाता। मौजूदा स्थिति में भारत को अपनी अब तक की नीति पर ही आगे बढ़ना चाहिए और अपने कूटनीतिक प्रयासों को तेजी से आगे बढ़ाना चाहिए। भारत को अपने व्यापक दीर्घकालीन हितों को ध्यान में रखते हुए ही कूटनीतिक प्रयास करने चाहिए।


 

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