साधो, उत्तर प्रदेश में गजब की गर्मी है। पर गर्मी कहां नहीं है! वह ईश्वर की भांति सर्वव्यापी है। फिर भी हमारे यहां पड़ने वाली गर्मी को मीडिया ज्यादा फोकस कर रहा है। जैसे विमर्श का और कोई मुद्दा ही न हो। जैसे मानसून ने केरल तट पर दस्तक ही न दी हो। बदायूं कांड को मीडिया ने ज्यादा गरमा दिया। इससे गर्मी का प्रकोप और अधिक बढ़ गया। बदायूं की घटना हमें भी गर्मी का एहसास करा रही है। वरना हम तो पार्टी की हार के चलते शीत ऋतु का अनुभव कर रहे थे। कांप रहे थे कि जब इस बार सिर्फ घर वाले ही जीते हैं, तो आगे कैसे चलेगा। पार्टी का क्या होगा? चहेतों की नैया कैसे पार लगेगी? लोकसभा चुनाव के नतीजे जैसे सुनामी बन गए।
हमने लैपटॉप बांटे, लेकिन उनका दुरुपयोग विरोधियों ने किया। हमारी हर कारगुजारी उलटी पड़ गई। मुसीबत जब आती है, तो अकेले नहीं आती। हम देश चलाने की सोच रहे थे, पर अब तो सूबा चलाना भी मुश्किल हो रहा है। इस मौसम में बिजली हमें ही झटका देने लगी है। करेंट ऐसे लग रहा है कि पूरा शरीर कंपायमान हो उठता है।
अब तो ऐरे-गैरे भी आंखें दिखाने लग गए हैं। कमबख्त वक्त ही ऐसा है। विपक्षी तो जैसे भस्म करने पर ही आमादा हैं। क्या सपने थे, कैसे-कैसे अरमान पाले थे। हम प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे। हमारे सब तरफ गद्देदार और ओहदेदार थे। गजब के पहरेदार थे। सबके सब अलमबरदार थे। हर कहीं असरदार थे। पर जीते वे, जो सरमायादार थे। हम इस गर्मी को कैसे बर्दाश्त करें। अब तो दिल्ली का सदन भी ऐसी लपटें मार रहा है कि शरीर फफोलियाने लगा है।
वैसे भी समाजवाद अधिक गर्मी बर्दाश्त नहीं कर पाता। पारा तनिक चढ़ा कि उसका जीना मुहाल हो गया। इतिहास में दर्ज है कि पहले भी अधिक गर्मी पड़ने पर समाजवाद के कुनबे मरने-टूटने लगे थे। हमने जैसे-तैसे फिर से उसे रोपा-उगाया। अब उस पर फिर बुरी नजर लग गई है। सोच रहा हूं कि गंडा-ताबीज ही करा लूं। अपने लिए नहीं, देश के लिए समाजवाद को बचाना जरूरी है।