फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

संस्कृति: होली का वास्तविक संदेश स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण है

पंकज चतुर्वेदी
Updated Tue, 07 Mar 2023 07:06 AM IST

सार

इस पर्व का वास्तविक संदेश तो स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण ही है। यह दुखद है कि इसने अपना पारंपरिक रूप और उद्देश्य खो दिया है।
विज्ञापन
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : iStock


विडंबना है कि अब होली का स्वरूप भयावह हो गया है। वास्तव में होली का अर्थ है- हो ली, यानि जो बीत गई सो बीत गई, अब आगे की सुध है। गिले-शिकवे मिटाओ, गलतियों को माफ करो और एक-दूसरे को रंगों में सराबोर कर दो-रंग प्रेम के, अपनत्व के, प्रकृति के। मगर भारतीय संस्कृति की पहचान कहलाने वाला यह पर्व पर्यावरण का दुश्मन, नशाखोरी, त्वचा को नुकसान पहुंचाने, आनंद की जगह भोंडे उधम के लिए कुख्यात हो गया है। पानी की बर्बादी और पेड़ों के नुकसान ने असल में हमारी आस्था और परंपरा की मूल आत्मा को ही नष्ट कर दिया है।


कहानियां, किंवदंतियां कुछ भी कहें, लेकिन इस पर्व का वास्तविक संदेश तो स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण ही है। यह दुखद है कि अब इस त्योहार ने अपना पारंपरिक रूप और उद्देश्य खो दिया है और इसकी छवि पेड़ व हानिकारण पदाथों को जलाकर पर्यावरण को हानि पहुंचाने और रंगों के माध्यम से जहर बांटने की बनती जा रही है। हालांकि देश के कई शहरों और मुहल्लों में बीते एक दशक के दौरान होली को प्रकृति-मित्र के रूप में मनाने के अभिनव प्रयोग भी हो रहे हैं। हमारा कोई भी संस्कार या उत्सव उल्लास की आड़ में पर्यावरण को क्षति की अनुमति नहीं देता। होलिका दहन के साथ सबसे बड़ी कुरीति हरे पेड़ों को काट कर जलाने की है। वास्तव में होली भी दीपावली की ही तरह खलिहान से घर के कोठार में फसल आने की खुशी व्यक्त करने का पर्व है।


कुछ सदियों पहले तक ठंड के दिनों में भोज्य पदार्थ, मवेशियों के लिए चारा, जैसी कई चीजें भंडार कर रखने की परंपरा थी। इसके अलावा ठंड के दिनों में कम रोशनी के कारण कई तरह का कूड़ा भी घर में ही रह जाता था। याद करें कि होली में गोबर के बने उपले की माला अवश्य डाली जाती है। असल में ठंड के दिनों में जंगल जाकर जलावन लाने में डर रहता था, सो ऐसे समय के लिए घरों में उपलों को भी एकत्र कर रखते थे। चूंकि अब घर में नया अनाज आने वाला है सो, कंडे-उपले की जरूरत नहीं, तभी उसे होलिका दहन में इस्तेमाल किया जाता है। दुर्भाग्य है कि अब लोग होली की लपटें आसमान से ऊंची दिखाने के लिए लकड़ी और कई बार प्लास्टिक जैसा जहरीला कूड़ा इस्तेमाल करते हैं।  


एक बात और, आदिवासी समाज में प्रत्येक कृषि उत्पाद के लिए 'नवा खाई’ पर्व होता है- जो भी नई फसल आई उसके लिए प्रकृति का धन्यवाद। होली भी किसानों के लिए कुछ ऐसा ही पर्व है। होलिका पर्व का वास्तविक समापन शीतला अष्टमी को होता है। पूर्णिमा की होली और उसके आठ दिन बाद अष्टमी का यह अवसर। शक संवत का पहला महीना चैत्र और इसके कृष्ण पक्ष पर बासी खाना खाने का बसौड़ा। स्कंद पुराण शीतलाष्टक स्रोत के अनुसार, वन्देहं शीतलां देवींरासभस्थां दिगम्बराम।


मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालड्कृतमस्तकाम। अर्थात गर्दभ पर विराजमान दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तकवाली भगवती शीतला की मैं वंदना करता हूं। शीतला माता के इस मंत्र से स्पष्ट है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में मार्जनी (झाड़ू) होने का अर्थ है कि समाज को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश से तात्पर्य है कि स्वच्छता रहने पर ही स्वास्थ्य रूपी समृद्धि आती है। हकीकत में संदेश यही है कि यदि स्वच्छता रखेंगे, तो रोग नहीं हो सकते। समाज में समरसता बनाए रखना, अपने परिवेश की रक्षा करना और जीवन में मनोविनोद बनाए रखना, यही होली का मूल दर्शन है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next