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श्री अन्न: उपज बढ़े पर पौष्टिकता भी बचे, हम जो खाना खाते हैं, वह धीरे-धीरे खोखला होता जा रहा

देविंदर शर्मा
Updated Tue, 07 Mar 2023 07:01 AM IST

सार

मोटे अनाज यानी बाजरा की उच्च उपज वाली किस्में विकसित करने का औचित्य नहीं है, क्योंकि फसल की उत्पादकता जितनी अधिक होती है, उसके पोषक तत्वों में उतनी ही गिरावट आती है। उच्च उत्पादकता से मोटे अनाज उस लाभ को खो देंगे, जिनके लिए वे जाने जाते हैं।
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बाजरा (सांकेतिक तस्वीर)। - फोटो : ANI


सोच में अंतर्निहित यह पूर्वाग्रह ही शायद दुनिया भर के कृषि वैज्ञानिकों को कम उपज वाले बाजरा की उत्पादकता बढ़ाने के लिए अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित कर रहा है। इंटरनेशनल क्रॉप रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरीड ट्रॉपिक्स (आईसीआरआईएसएटी) से लेकर भारतीय कदन्न अनुसंधान संस्थान (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मिलेट्स रिसर्च) तक, और अन्य विश्वविद्यालयों और संस्थानों में काम करने वाले वैज्ञानिकों द्वारा अब उच्च उपज वाली बाजरा की किस्मों के विकास पर जोर दिया जा रहा है।


एक पादप प्रजनक के रूप में प्रशिक्षित होने के नाते मुझे लगता है कि उच्च उपज वाली फसल की किस्में विकसित करने के लिए एक वैज्ञानिक तंत्र विकसित करना फसल उत्पादकता बढ़ाने और इस तरह वैश्विक भूख मिटाने  का एक महत्वपूर्ण उपकरण रहा है। इसी वजह से पादप प्रजनक नॉर्मन बोरलॉग को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हरित क्रांति के जनक माने जाने वाले बोरलॉग ने गेहूं के चमत्कारी बौने बीज विकसित किए थे। उसके बाद धान की अधिक उपज देने वाली किस्मों का विकास हुआ और फिर अन्य फसलों के लिए भी।


लेकिन ऐसे समय में जब हम दुनिया को दो बार खिलाने के लिए पर्याप्त भोजन का उत्पादन करते हैं, मुझे पादप वैज्ञानिकों (और नीति निर्माताओं) द्वारा उच्च उपज वाली किस्में विकसित करने और बाजरा में जैव-फोर्टिफिकेशन (किसी खाद्य फसल के सूक्ष्म पोषक तत्वों को बढ़ाने की प्रक्रिया) के लिए दिखाए जा रहे उत्साह के पीछे का तर्क समझ में नहीं आता। मुझे लगता है कि यह दृष्टिकोण बेहद गलत है, क्योंकि ग्लूटेन (लस) मुक्त बाजरा न केवल सूखा प्रतिरोधी है, बल्कि इसमें प्रोटीन, सूक्ष्म पोषक तत्व, फाइबर और एंटी-ऑक्सीडेंट भी प्रचुर हैं। चूंकि बाजरा पहले से ही पोषक तत्वों से भरपूर है, ऐसे में, हमारा जोर बाजरा के साथ पूरक आहार लेने पर होना चाहिए। नीति निर्माताओं को बाजरा उत्पादन बढ़ाने के बारे में अधिक कल्पनाशील होना चाहिए, न कि उसी पूर्वाग्रह का पालन करना चाहिए, जिस पर औद्योगिक खेती निर्भर करती है : फसल उत्पादकता में वृद्धि कर बफर स्टॉक बढ़ाना।


मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि बहुत से लोगों को नहीं पता कि उच्च उपज वाली फसल की किस्मों में व संकर नस्ल विकसित करने के क्रम में आनुपातिक रूप से उनमें पोषक तत्वों में भी उतनी ही गिरावट आती है। यानी फसल की उत्पादकता जितनी अधिक होती है, उसके पोषक तत्वों में उतनी ही गिरावट आती है। यह मुख्य सिद्धांत है, जो पादप प्रजनन हमें सिखाता है, लेकिन अधिक उत्पादकता के चक्कर में हम इसे भूल जाते हैं। दोहराव के जोखिम के बावजूद यह बताना जरूरी है कि औसतन 15 से 40 फीसदी तक गिरावट आती है, जबकि गेहूं के मामले में कोबाल्ट जैसे कुछ खनिजों की उपलब्धता तो 80 प्रतिशत तक घट जाती है।


ऐसा माना जाता है कि गेहूं में कोबाल्ट जैसे ट्रेस खनिज (जीवित उत्तकों में मौजूद पोषक खनिज) की हिस्सेदारी में भारी गिरावट के कारण कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ गया है, नतीजतन हृदय रोगों में वृद्धि हुई है। इसके अलावा, कंसास यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन ने पहले ही बता दिया था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद फसल की किस्मों में छह पोषक तत्वों (प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, फॉस्फोरस, राइबोफ्लेविन और एस्कॉर्बिक एसिड) में गिरावट देखी गई है। पोषक तत्वों में गिरावट प्रोटीन में छह प्रतिशत से लेकर राइबोफ्लेविन में 38 फीसदी तक होती है।


इसका मतलब है कि हम जो खाना खाते हैं, वह धीरे-धीरे खोखला होता जा रहा है। आप इससे पेट तो भर सकते हैं, लेकिन खाद्यान्न उन तत्वों से वंचित रह जाता है, जो ताकत और स्वस्थ विकास प्रदान करते हैं। यदि ऐसा है, तो मोटे अनाज यानी बाजरा की उच्च उपज वाली किस्मों को विकसित करने का औचित्य नहीं है, क्योंकि तब वे आवश्यक पोषक तत्वों से रहित हो जाएंगे। मोटे अनाज में गेहूं और चावल की तुलना में 30 से 300 फीसदी अधिक पोषक तत्व होते हैं।
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उच्च उत्पादकता के लिए प्रजनन करने से मोटे अनाज निश्चित रूप से उस लाभ को खो देंगे, जिनके लिए वे जाने जाते हैं। पहले से ही 25 तरह के अधिक उपज देने वाले और रोग प्रतिरोधी संकर बाजरा विकसित किए जा चुके हैं। अन्य 35 संकर ज्वार भी विकसित किए गए हैं। लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ये उतने ही पौष्टिक हैं या उससे अधिक, जितने कि वर्तमान में किसान खेती कर रहे हैं।


बाजरा का ही उदाहरण लीजिए। पौधों में उपलब्ध आयरन और जिंक की उच्च क्षमता से आयरन और जिंक के साथ बायो-फोर्टिफाइड संकर बाजरा विकसित किया जाता है, जो 30-140 मिलीग्राम आयरन प्रति किलो और 20-90 मिलीग्राम जिंक प्रति किलो के बीच होता है। लेकिन जैसा कि आईसीआरआईएसएटी के एक अध्ययन ने दर्शाया था कि विकसित वाणिज्यिक संकरों में पोषक तत्वों की मात्रा बहुत कम होती है-प्रति किलो में 42 मिलीग्राम आयरन और 31 मिलीग्राम प्रति किलो जस्ता। यदि बाजरे की अधिक उपज देने वाली और संकर किस्मों के पोषक गुणों पर ज्यादा अध्ययन किया जाए, तो हमें इसके पोषण स्तर में गिरावट के बारे में अधिक स्पष्ट तस्वीर मिलेगी। बाजरा को बढ़ावा देने के लिए और अधिक व्यापक दृष्टि का आह्वान करते हुए पत्रकार विभा वार्ष्णेय ठीक ही कहती हैं- 'यदि संकर किस्म जंगली किस्मों की तरह पौष्टिक नहीं हैं, तो उन्हें पोषक-अनाज के रूप में प्रचारित करना ठीक नहीं लगता।'


हम निश्चित रूप से नहीं चाहते कि बाजरा खोखला भोजन बने। बाजरा को बाजरा ही रहने दें, क्योंकि अपनी पौष्टिकता के कारण ही वह जाना जाता है।      

 

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