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अनियोजित शहरीकरण की बड़ी कीमत

Fri, 26 Sep 2014 11:47 PM IST
उमेश चतुर्वेदी
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बढ़ते पर्यावरण असंतुलन को लेकर राजनीति की रीति भी अजीब है। सम्मेलनों में तो नीति-नियंता इसे बदलने का दावा करते हैं। लेकिन जब इसका वक्त आता है, तो वे इसकी जिम्मेदारी दूसरे देशों पर थोप देते हैं। यही वजह है कि जब भी जलवायु परिवर्तन पर शिखर बैठकें होती हैं, तब पर्यावरण बचाने की कवायद में जुटे कार्यकर्ता इस विडंबना को उजागर करने की कोशिश में सामने आते हैं। न्यूयार्क में 23 सितंबर को हुए जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन को भी इसी नजरिये से देखना चाहिए।
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लेकिन दुर्भाग्यवश परिवर्तन को लेकर हो रही चर्चाओं की तरफ न मीडिया का ध्यान जाता है, न आम जनता का। इस जलवायु सम्मेलन से पहले संयुक्त राष्ट्र ने एक अहम रिपोर्ट जारी की, जिसके मुताबिक भारत शहरी क्रांति की ओर बढ़ रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार, 2031 तक भारतीय शहरों और कस्बों में करीब साठ करोड़ लोग रहने लगेंगे। रपट यह भी बताती है कि दो दशकों में भारत की शहरी आबादी 21 करोड़ 70 लाख से बढ़कर 37 करोड़ 70 लाख हो चुकी है। आबादी का यह आंकड़ा 2031 तक बढ़कर कुल जनसंख्या का चालीस प्रतिशत हो जाएगा।

संयुक्त राष्ट्र का यह आंकड़ा लोकसभा चुनाव से पहले का है। तब अपने चुनावी घोषणापत्र में भाजपा ने देश में सौ स्मार्ट सिटी बनाने और शहरीकरण को बढ़ावा देने का वायदा किया था। अगर ऐसा हुआ, तो 2031 तक शहरी आबादी का अनुपात और बढ़ेगा। संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा रिपोर्ट के अनुसार, अगले बीस साल में हमारे यहां बढ़ते शहरों में आधारभूत संरचना मुहैया कराने के लिए 827 अरब डॉलर का निवेश करना होगा। पर अगर स्मार्ट सिटी योजना लागू हुई, तो और अधिक निवेश की जरूरत पड़ेगी।
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विकास के जिस तरीके को हमने स्वीकार किया है, उसमें शहरीकरण को ही विकास का आधार माना गया है। गांधी जी ने हिंद स्वराज में ग्रामीण सभ्यता को ही बढ़ावा देने का खाका पेश किया था, जिसके मुताबिक गांवों को स्वावलंबी और स्वच्छ बनाया जाना था। पर आजादी के बाद की सरकारों ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। विकास की जो योजनाएं बनीं, उसके केंद्र में शहर रहे। नतीजतन कृषि आधारित रोजगार कम होता गया और ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर पलायन बढ़ा। इससे शहरों पर दबाव बढ़ा और एक बड़ी आबादी को झुग्गी-झोपड़ियों में नारकीय जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ा।

संयुक्त राष्ट्र ने बहुत पहले महानगर नाम से एक पुस्तिका छापी थी, जो बताती थी कि आबादी की बदहाली महानगरों में ज्यादा है। शहरों में बेशक सहूलियतें गांवों की तुलना में ज्यादा हैं, पर स्वास्थ्य की दृष्टि से यह जीवन ठीक नहीं। उस पुस्तिका के मुताबिक, मैक्सिको सिटी, शिकागो, नाइजीरिया की राजधानी नाइजर और मुंबई जैसे शहरों में बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे अस्वास्थ्यकर माहौल में जिंदगी गुजारने को मजबूर है। भारतीय नगरीकरण पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट भी बताती है कि 2050 तक भारत में मृत्यु दर में बढ़ोतरी होगी, जिसका बड़ा कारण शहरी वायु प्रदूषण होगा।

दरअसल बढ़ते शहरीकरण के चलते पर्यावरण असंतुलन बढ़ा है। शहरों के बाहरी इलाकों में विस्तार हो रहा है। यह विकास अनियोजित तरीके से तो हो ही रहा है, इसमें शहरी मापदंडों और नियमों का उल्लंघन भी हो रहा है। इसी कारण शहरी आबादी के बड़े हिस्से को संसाधनों की भारी कमी का सामना करना पड़ता है। सवाल यह है कि क्या हमारी सरकारें इस अनियोजित विकास पर पुनर्विचार करेंगी। जनता तो खैर जब तक जागरूक होगी, तब तक शहरीकरण की चमक में वह बहुत कुछ खो चुकी होगी।
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