इन दिनों दुनिया भर में भारत की जीडीपी और बढ़ती आर्थिक असमानता के बारे में विश्वविख्यात लेखक थॉमस पिकेटी और लुकास चैंसेल द्वारा प्रकाशित शोधपत्र को पढ़ा जा रहा है। इस शोधपत्र पर आर्थिक-सामाजिक विश्लेषकों द्वारा चर्चाएं हो रही है, परंतु इसके निष्कर्षों पर भारत में ध्यान नहीं दिया जा रहा है। बिकैटी और चैंसेल के इस शोधपत्र का सारांश यह है कि भारत में 1980 के बाद हुए सुधारों के अमूमन अधिकांश लाभ समृद्ध लोगों को ही मिले हैं। आर्थिक सुधारों के दौर में समाज के बीच असमानता तेजी से बढ़ी है। 1980 से पहले के तीन दशकों में असमानता में कमी आ रही थी, जबकि उस समय जीडीपी की वृद्धि दर सुस्त ही थी। लेकिन 1980 के बाद गरीबों और अमीरों के बीच असमानता तेजी से बढ़ी है।
ऐसे में विभिन्न आर्थिक-सामाजिक अध्ययनों में देश के गरीबों और आम आदमी की खुशियों के लिए अधिक कारगर प्रयासों की जरूरत बताई गई है। वस्तुत: भारत के गरीब व आम आदमी संतोषजनक स्थिति में नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट-2017 में 155 देशों की सूची में भारत 122वें स्थान पर है। भारत के पीछे होने का प्रमुख कारण गरीबी, स्वास्थ्य और शिक्षा में भारत का संतोषजनक प्रदर्शन नहीं होना बताया गया। विश्व बैंक ने भी एक नवीनतम अध्ययन में बताया है कि भारत की 42 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत करती है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के केवल सात फीसदी श्रमिक ही पेंशन योजना के दायरे में हैं।
अर्थविशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को विकास दर बढ़ाने के साथ-साथ गरीबों के कल्याण की नई योजनाओं पर भी ध्यान देना होगा। इस ओर सरकार कदम बढ़ाते हुए भी दिखाई दे रही है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सौभाग्य योजना अर्थात प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना का शुभारंभ किया। इससे भारत सरकार ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों के सभी इच्छुक घरों को मार्च, 2019 तक बिजली की पहुंच सुनिश्चित करेगी। वर्ष 2017 की शुरुआत से सरकार ने अपनी नीतियों को जिस तरह ग्रामीण भारत और गरीबों पर केंद्रित किया है, उसका लाभ भी आम आदमी को मिलता दिख रहा है। सरकार गरीबों के लिए शौचालय बनवाने और गरीब महिलाओं को मुफ्त गैस सिलिंडर देने की डगर पर तेजी से आगे बढ़ी है। नई स्वास्थ्य नीति के तहत अब स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2.5 फीसदी धन खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही देश के 80 फीसदी लोगों का इलाज सरकारी अस्पतालों में मुफ्त करने का लक्ष्य भी रखा गया है।
निश्चित रूप से देश के लोगों की सामाजिक सुरक्षा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा की स्थिति को संतोषजनक बनाना जरूरी है। आम आदमी के धन का एक बड़ा भाग जरूरी सार्वजनिक सेवाओं, स्वास्थ्य सुविधा और शिक्षा में व्यय हो रहा है। इस कारण बेहतर जीवन स्तर की अन्य जरूरतों की पूर्ति में वे बहुत पीछे हैं। चूंकि तेज आर्थिक विकास ने करोड़ों भारतीयों में बेहतर जिंदगी की महत्वाकांक्षा जगा दी है, ऐसे में जब देश के करोड़ों लोगों को उपयुक्त सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ एवं शिक्षा सुविधाएं नहीं मिल पा रही है, तो उनकी निराशाएं बढ़ती जा रही हैं। देश में इस समय ऐसा नया आर्थिक माहौल और ऐसी नई आर्थिक रणनीति विकसित करना आवश्यक है, जो रोजगार, आम आदमी और गरीबों की खुशहाली पर केंद्रित हो।