कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध पंक्तियां हैं-जोदि तोर डाक शुने केऊ ना आसे, तबे एकला चलो रे! यानी यदि तुम्हारी आवाज सुनने वाला कोई न मिले, तो अकेले चलो। इस बार दुर्गा पूजा पर ऐसा ही हुआ। मेरी माशी मां कोलकाता से बरिशाल (बांग्लादेश) दुर्गा पूजा के लिए जा रही थीं। प्रायः क्षणांश में मेरा भी मन जाने का हुआ। वीजा लिया और रात की उड़ान से पहुंचा कोलकाता।
दुर्गा पूजा हो और बंगाल सोए, यह संभव नहीं। हवाई अड्डे से घर तक का दस किलोमीटर का सफर पूरा करने में ढाई घंटे लगे-स्त्री, पुरुष, बच्चे दुर्गा पूजा पंडालों में दर्शनार्थ जा रहे थे। दुनिया में हिंदुओं जैसा उत्सवप्रिय समाज कहां होगा! आपदाओं, विरोधों के बीच भी वह खुशियों के दीप जला ही लेता है।
कोलकाता से सुबह पांच बजे चल पेट्रोपोल सीमा से हम प्रायः दस बजे बांग्लादेश में दाखिल हुए। उधर का वातावरण साफ-सुथरा था। दो बड़े स्तंभों पर रवींद्रनाथ टैगोर तथा काजी नजरूल इस्लाम के उत्कीर्ण चित्र थे। बांग्लादेश का राष्ट्रगीत-आमार सोनार बांग्ला भी रवींद्रनाथ टैगोर रचित है। बांग्लादेश की सीमा पर बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान और शेख हसीना के भी सुंदर चित्र थे। जबकि भारत की ओर न तो राष्ट्रपति और न ही प्रधानमंत्री के चित्र थे। राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत का दर्शन कराना तो दूर की बात है!
पेट्रोपोल से बांग्लादेश के हिंदुओं की दुर्गापूजा का पहला मंडप केराल कट्ठा ठाकुरबाड़ी में था, जो जेसोर जिले में है। केराल कट्ठा की दुर्गा पूजा सुंदर थी। बड़ी संख्या में हिंदू परिवार वहां मिले। पूजा संस्कृत में हो रही थी। लाउडस्पीकर पर दुर्गा सप्तशती के पाठ की ध्वनि गूंज रही थी। मुझे बताया गया कि कुछ वर्ष पूर्व तक यहां दुर्गा पूजा मनाना भी संभव नहीं था। आज भी डर तो रहता है कि कहीं कोई जमाते इस्लामी के जेहादी तत्व पूजा मंडप न तोड़ दे।
आगे सातखिरा जिला था। वहां इनाउडांगा गांव, फिर मायेर बाड़ी (मां का घर) दुर्गा पूजा मंडप गए। वही दृश्य, सरल-सामान्य मंडप-आम तौर पर इस क्षेत्र में हिंदू ग्रामीण कृषक हैं। सरकारी नौकरी अथवा व्यापार में उन्हें कम स्थान प्राप्त है, पर त्योहार तो त्योहार है। मन में उमंग उठती है, नए कपड़े, मिठाई, दुर्गा की मूर्तियों का सृजन और फिर विसर्जन। सातखिरा जिले में हमने छह मंडप देखे। तब तक मध्य रात्रि हो चुकी थी। इसके अलावा हम ढाका के भी विभिन्न पंडालों में गए। बंगाल में दुर्गापूजा या नवरात्रि पर व्रत-उपवास रखते हुए हमने किसी को नहीं देखा। सब दावत के मूड में होते है।
अगर बंगाली हिंदू इन दिनों अपने धार्मिक उत्सव वहां अच्छी तरह मना रहे हैं, तो आप मानें या न मानें, उसका कारण भारत बांग्लादेश संबंधों में आया सकारात्मक परिवर्तन है।
धानमंडी की दुर्गापूजा में मुझे भारत की ओर से बोलने के लिए कहा गया, तो प्रधानमंत्री मोदी का नाम लेते ही माहौल में उत्साह भर गया। बंगबंधु मुजीब, शेख हसीना के नाम भारत में भी सकारात्मक भाव पैदा करते हैं। लेकिन मुस्लिम कट्टरवाद, असहिष्णुता, हिंदू द्वेष ने रिश्तों में दरार डाल दी है। वही द्वेष हिंदू रोहिंग्या शरणार्थियों को परेशान किए हुए है। यह द्वेष उस सांस्कृतिक धारा से खत्म हो सकता है, जिस धारा में भाषा, वसंत जैसे पर्व, रवींद्र-नजरूल के गीत, बांग्लादेशी संभ्रांत महिलाओं द्वारा सिंदूर और शंख की चूड़ियों का उपयोग हमें बांधता है। इसे बढ़ाने वाले प्रयास ही गंगा और पद्मा की एकरूप धारा हमारे विष्णण हृदयों को सरस करेगी।