क्यों, तुम तो कहते थे कि मोबाइल नहीं रखते हो...और मैंने अभी देखा कि तुम बात कर रहे थे? उसे लगा, मैं उसे नंबर नहीं देना चाह रहा था। मोबाइल से बात नहीं कर रहा था... दांत में दर्द है... इसलिए गाल पर हाथ रखे था। मैंने सच बताया, तो उसका खुला मुंह बंद ही नहीं हुआ।
बस, मेरे दाढ़ या दांत के दर्द की खबर जंगल की आग जैसी इधर से उधर फैल गई। जितने मुंह, उतनी दवाएं, उतने नुस्खे। लौंग का तेल रूई के फाहे में दांत के नीचे रख लेना, देखना-दर्द कैसे हवा होता है...बस, एक शर्त है...तेल शुद्ध होना चाहिए।' मुझे शुद्ध लौंग तो समझ में नहीं आता, तेल कहां से समझ में आएगा। लौंग का शुद्ध तेल कैसा होता है, यह बताने को कोई तैयार नहीं था।
अजवाइन का तेल गर्म कर लेना, उसमें लहसुन डालना और जब वह लाल होकर तैयार जाए, तो उसे दाढ़ के नीचे रखना, शर्तिया इलाज है। एक और बिन मांगी दवा हाजिर हो गई।
फिर तो यह आलम हो गया कि गैर की महफिल से भी सलाम आने लगे। अब दाढ़ में दर्द होता भी है, तो गाल पर हाथ नहीं रखता हूं। मोबाइल का आरोप तो ठीक है, बर्दाश्त कर भी लूं, मगर घर में इतनी दवाएं, नुस्खे, जड़ी-बूटियां, गंडे-ताबीज और मंत्रसिद्ध पानी इकट्ठा हो गया है कि छोटी-सी डिस्पेंसरी तो मैं भी कभी शुरू कर सकता हूं।
यह खूबी दाढ़-दांत के दर्द की ही है कि जो भी इसका मरीज हुआ, वही आगे चलकर डॉक्टर, हकीम, वैद्य हो गया। शायद इसलिए कहा जाता है कि दांत का दर्द सबसे बुरा होता है, क्योंकि दांत तो ठीक हो जाता है, लेकिन मरीज, फिर मरीज नहीं रह जाता है, वह चारागर बन जाता है।
वैसे, सच बात यही है कि ये सारे नुस्खे हाथी के दांत जैसे दिखाने वाले होते हैं। खाने को तो एलोपैथी वाला इलाज ही होता है कि डॉक्टर ऐसी तगड़ी एंटीबायोटिक देता है कि...आप दांत का दर्द भूल ही जाते हैं और पेट दर्द से हाय-हाय करने लगते हैं।