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हजारों गरीबों को किसने शौचालयों से वंचित रखा

Thu, 12 Jun 2014 07:30 PM IST
सुभाषिनी अली
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लोकसभा चुनाव के बाद आए अच्छे दिनों की कहानी के कई पहलू हैं। जिस पहलू पर सबसे अधिक ध्यान दिया जा रहा है, वह है, सेंसेक्स में आई अभूतपूर्व उछाल। वह भी पिछले दिनों में कुछ पीछे खिसकने लगी है। लेकिन एक अन्य पहलू, जिस पर काफी टिप्पणियां की जा रही हैं, वह है बलात्कार के मामलों में बढ़ोतरी। उत्तर प्रदेश की घटनाओं ने तो हमारी तमाम संवेदनशीलता को स्तब्ध कर देने का काम किया है।
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बलात्कार की कोई भी घटना घटती है, तो उच्च पदों पर आसीन जिम्मेदार लोग फौरन टिप्पणी करना शुरू कर देते हैं। ले-देकर इसका असली मतलब होता है, लड़कियों और औरतों पर उनके साथ होने वाली हिंसा की जिम्मेदारी सौंपना। वे उन्हें कपड़े, रहन-सहन से संबंधित तमाम तरह के उपदेश देने से खुद को रोक नहीं पाते। उनकी मंशा सिर्फ पुरुष समुदाय को ही नहीं, बल्कि खुद को और अपनी सरकारों को भी महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी से बरी करने की है। और फिर तमाम लोग उनकी हां में हां मिलाने लगते हैं कि आखिरकार, सरकार कर भी क्या सकती है! जब समाज ही पतन की तरफ जा रहा है, तो कोई मंत्री इसकी गति को कम कर सकता है? इत्यादि, इत्यादि!

सच तो यह है कि न्याय प्रक्रिया को गरीब और कमजोर वर्गों को न्याय देने की दिशा में घुमाने का काम तो सरकारें कर ही सकती हैं। पीड़ित लड़कियों को मदद देने का काम भी उनका है। लेकिन इन्हें करने में सरकारें असमर्थता जता रही हैं। तो क्या गांवों और कस्बों में सरकारें शौचालय बनवाने का काम भी नहीं कर सकती हैं? जब भी बलात्कार पीड़िताओं के वर्णन छपते हैं, तो उनकी गरीबी और सामाजिक स्तर में उनकी निचली सीढ़ियों पर होने की बात सामने आती है, लेकिन इस पर गौर नहीं किया जाता कि हमारे देश में शौचालय का होना, न होना भी जाति और आर्थिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ तथ्य है। गांवों और कस्बों में रहने वाले पिछड़ी और दलित जाति के लोग अक्सर गरीब और भूमिहीन होते हैं। सरकारों को उनकी मड़इयों में प्राथमिकता के आधार पर शौचालय बनवाने चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता है।
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उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले का नाम बहुत से लोगों ने एक महीने पहले सुना भी नहीं होगा। पर आज देश तो छोड़िए, विदेशों में भी इस जिले का नाम कुख्यात हो गया है। इस जिले के कटरा सआदतगंज गांव में, जहां वह शर्मनाक घटना हुई, 174 बीपीएल परिवार हैं, लेकिन इनमें से दो घरों में निर्मल शौचालय मौजूद है, वह भी सरकारी आंकड़ों में। इस गांव में कुल 267 एपीएल परिवार हैं, जिनमें से 210 घरों में शौचालय नहीं हैं। गांव में छह स्कूल और तीन आंगनबाड़ी हैं, लेकिन इनमें से एक में भी शौचालय नहीं है। उत्तर प्रदेश में जितनी किल्लत शौचालय की है, उतनी ही बिजली की भी, सो सात बजे से ही घुप्प अंधेरा था।

इस मामले की जांच अब सीबीआई करेगी। हो सकता है कि बलात्कारियों और मामले में लापरवाही दिखाने वाले पुलिस वालों को सजा भी मिल जाए, लेकिन उनके गांव और उनके गांव जैसे हजारों गांवों के गरीबों को शौचालयों से वंचित रखने की सजा किसको दी जाएगी।
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