हम सभी युवा न्यूरो वैज्ञानिक थे, जिन्होंने अभी हाल ही में अपनी पीएचडी पूरी की थी। मेरा परिवार तेहरान में रहता था और मुझे आज भी याद है कि मेरी मां लेटी हुई थीं। सामने मेज पर उनके दिमाग का स्कैन रखा था। मैं उनसे बहुत दूर थी, लेकिन स्कैन में देख चुकी थी कि कैसे एक स्ट्रोक मेरी मां के दिमाग को वैसे ही खा रहा है, जैसे कोई ब्लैक होल तारे को निगल रहा हो। मेरी मां 62 वर्ष की स्वस्थ महिला थीं, लेकिन स्ट्रोक और उसके बाद कोमा ने उनकी स्थिति बेहद खराब कर दी थी। मुझे पहली बार लगा कि मैं उन्हें खो दूंगी। उनकी हर बात मुझे याद आ रही थी। अंतिम बार जब हमने बात की थी, तो मैंने उन्हें बताया था कि मैं उन्हें कितना प्यार करती हूं। मुझे याद आता है कि बचपन में कैसे उन्होंने मुझे अक्षरों को लिखना और पढ़ना सिखाया था। जब अंतिम बार मैं तेहरान में अपने घर आई थी, तो उन्होंने मुझे मेरी पसंदीदा चीजें खिलाई थीं। तब मैं भविष्य में होने वाली इन घटनाओं से पूरी तरह अंजान थी। मेरी मां को स्ट्रोक पड़ने से पहले तक मुझे लगता था कि समय एकरेखीय है, जो हमेशा एक ही दिशा में चलता है। लेकिन दुख के लेंस से जब मैंने समय को देखा, तो अपनी पूरी जिंदगी को बिखरा हुआ पाया।
दुख ने मेरे मन को उस अतीत में भेज दिया, जहां मेरी मां वह तारा थीं, जिनके चारों ओर हमारा परिवार घूमता था। दुख हमें समय यात्री यानी टाइम ट्रैवलर बनाता है। स्ट्रोक के 43वें दिन मां चली गईं। अब दूरियों व अतीत के दुखों का बोझ नहीं है। मैं सपनों में उनसे मिलती हूं। मैं उस डॉक्यूमेंटरी फिल्म को दोबारा देख रही हूं। खगोल वैज्ञानिक कहते हैं, ‘हम एक ही पदार्थ के बने हैं।’ नए खून के लिए नए आयरन और नई हड्डियों के लिए नए कैल्शियम की जरूरत होती है। लेकिन इसकी शुरुआत एक भौतिकवादी इच्छा से होती है। फिर प्राणी जन्म लेते हैं और प्रक्रिया आगे बढ़ती है। मैंने मां के लिए कभी शोक नहीं जताया। दुख का कोई अंत नहीं है। जीवन एक टाइम मशीन है, बदलाव की शक्ति है, नई उत्पत्ति की कहानी है। क्या यहीं से मेरी शुरुआत होती है?