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खेती: साकार होगा हरित कृषि का सपना, नैनो उर्वरक के इस्तेमाल से आसान हो सकती हैं राहें

मनसुख मांडविया
Updated Thu, 09 Nov 2023 12:16 PM IST

सार

नैनो उर्वरक पारंपरिक उर्वरक की खपत कम कर सकता है, जिससे पर्यावरण के अनुकूल टिकाऊ कृषि को बढ़ावा मिलेगा।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला


हालांकि, उर्वरकों के असंतुलित उपयोग के कारण मिट्टी की उर्वरता तथा मिट्टी और जल संरक्षण के महत्वपूर्ण पहलू को अक्सर नजर अंदाज कर दिया जाता है। परिणामस्वरूप मिट्टी में पोषक तत्वों और पानी की कमी हो गई है, जो उनकी उर्वरता स्थिति में दिखाई पड़ती है। इसी वजह से उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए एक अभिनव तकनीक की आवश्यकता हुई। इस समस्या को हल करने और उर्वरक के कम उपयोग से ही अधिक उत्पादन करने के लिए नए युग की नैनो तकनीक सामने आई है, यानी उर्वरकों की दक्षता बढ़ाने के साथ पर्यावरण फुटप्रिंट में कमी करना।


प्रधानमंत्री के 'मेक इन इंडिया' आह्वान से प्रेरणा लेते हुए वैज्ञानिकों व इंजीनियरों ने नैनो यूरिया (तरल) विकसित किया है, जो स्वदेशी रूप से विकसित पहला नैनो उर्वरक है। यह राष्ट्र की खाद्य व पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अमृत काल के दौरान 'आत्मनिर्भर कृषि' और 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत की गई पहल का आदर्श उदाहरण है। अब तक गुजरात के कलोल तथा उत्तर प्रदेश के फूलपुर व ओनला में 17 करोड़ बोतलों की क्षमता वाले नैनो यूरिया संयंत्र स्थापित किए गए हैं। वर्ष 2025 तक नांगल, ट्रॉम्बे, बंगलूरू, देवगढ़, गुवाहाटी समेत कई स्थानों पर अन्य नैनो संयंत्र तैयार हो जाएंगे, जिससे नैनो यूरिया उत्पादन क्षमता 44 करोड़ बोतल/वर्ष से अधिक हो जाएगी, जो पारंपरिक यूरिया के लगभग 195 एलएमटी के बराबर होगी।


नैनो यूरिया की कीमत यूरिया के एक बैग की कीमत से 16 प्रतिशत कम है और किसान इसे आसानी से अपने खेतों तक ले जा सकते हैं। पूंजीगत व्यय, ऊर्जा खपत और कार्बन डाइऑक्साइड के कम उत्सर्जन के मामले में भी पारंपरिक यूरिया संयंत्र की तुलना में नैनो यूरिया संयंत्र लाभप्रद हैं। नैनो यूरिया- एनयू (तरल) पोषक तत्व उपयोग की उच्च दक्षता प्रदर्शित करता है और इसे अपनाने से कृषि उत्पादकता, उपज की गुणवत्ता, किसानों के लिए लाभ में वृद्धि होती है, जबकि मिट्टी, जल और वायु प्रदूषण, लॉजिस्टिक्स एवं भंडारण लागत में कमी आती है। पिछले तीन सीजन के दौरान, 192 लाख किसानों ने 150 लाख हेक्टेयर भूमि पर यूरिया की खुराकों के संभावित विकल्प के रूप में नैनो यूरिया लिक्विड की 6.5 करोड़ बोतलों (500 मिलीलीटर प्रत्येक) का उपयोग किया है। किसानों के खेतों के स्तर पर भी, नैनो यूरिया के उपयोग के बेहद उत्साहजनक परिणाम मिल रहे हैं। वर्ष 2021-22 की तुलना में 2022-23 के दौरान नैनो यूरिया की बिक्री में जहां 55 प्रतिशत की वृद्धि हुई, वहीं पारंपरिक यूरिया की बिक्री में महज चार प्रतिशत की मामूली वृद्धि ही दर्ज की गई।


नैनो डीएपी, जो कि हाल ही में आया एक नैनो उर्वरक है, फसलों के पोषण के मामले में एक और उपलब्धि है। यह पारंपरिक उर्वरक की खपत कम कर सकता है, जिससे डीएपी के आयात में कमी आएगी। उर्वरकों के क्षेत्र में नैनो एनपीके, नैनो जिंक, नैनो कॉपर, नैनो बोरोन, नैनो सल्फर आदि के विकास की दिशा में हो रहे आगे के शोध से पर्यावरण के अनुकूल टिकाऊ कृषि को बढ़ावा मिलेगा। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी, लोगों की सब्सिडी, परिवहन और अन्य विविध लागतों की बचत के रूप में मिलने वाले लाभ कई गुना बढ़ जाएंगे।


नैनो यूरिया एवं अन्य नैनो उर्वरकों को व्यापक रूप से अपनाए जाने से किसानों की लाभप्रदता में वृद्धि होगी और संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सतत विकास लक्ष्यों को हासिल किया जा सकेगा।

-लेखक केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री हैं।
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