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गोरखधंधा: फर्जी विश्वविद्यालयों के जाल में शिक्षा, छात्रों के भविष्य को बचाने के लिए होना पड़ेगा सजग

रोहित कौशिक
Updated Fri, 06 Oct 2023 07:47 AM IST

सार

सरकार फर्जी विश्वविद्यालयों और उनके क्रियाकलापों पर ध्यान दे, ताकि छात्रों के भविष्य को बचाया जा सके।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : istock


अगर ऐसे विश्वविद्यालयों पर पहले ही कार्रवाई हो जाती, तो हजारों छात्रों के भविष्य पर मंडराते खतरे को दूर किया जा सकता था। यूजीसी समय-समय पर छात्रों को जानकारी देने के लिए फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची अपनी वेबसाइट पर जारी करता है। लेकिन फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची प्रकाशित कर देने मात्र से ही यूजीसी और सरकार अपनी जिम्मेदारी से बरी नहीं हो जाते। ऐसे विश्वविद्यालयों को चलने देना और उनके संचालकों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करना तो और भी बड़ा अपराध है।


आज गली-गली में निजी शिक्षा संस्थानों की बाढ़ आ गई है, जिनमें से कुछ शिक्षा संस्थानों के क्रियाकलाप संदिग्ध हैं। बीती सदी के नब्बे के दशक में उदारीकरण की आंधी ने अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ शिक्षा क्षेत्र को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया। हालांकि उससे पहले भी कुछ राज्यों में उच्च शिक्षा निजी हाथों में जा चुकी थी, लेकिन नब्बे के दशक में व्यापक रूप से पूरे देश में शिक्षा को निजी हाथों में सौंप दिया गया। सरकार ने खुद कमाओ, खुद खाओ की नीति के तहत शिक्षा का निजीकरण करते हुए गर्व का अनुभव किया। सरकार की इस नीति से अनेक औद्योगिक घराने अपना पारंपरिक व्यापार त्याग कर शिक्षा के क्षेत्र में कूद पडे़। बाद में छोटे व्यवसायी भी इस लाभप्रद धंधे में शामिल हो गए।


चूंकि हमारे देश में शुरू से ही शिक्षा प्रदान करने का प्रायोजन धर्मार्थ माना गया है। इसलिए सरकार की नई नीति के तहत शिक्षा प्रदान करते हुए इन सभी व्यापारियों को धर्म एवं समाज सेवा का आवरण अपने आप मिल गया। धर्म एवं समाज सेवा के आवरण में मुनाफा कमाने का इससे अच्छा साधन और कोई नहीं हो सकता था। शिक्षा के व्यवसाय में लगे व्यापारी की छवि मुनाफा कमाने वाले के बजाय परोपकार करने वाले की बन गई। दुर्भाग्य से एक के बाद एक आने वाली सरकार इसी नीति पर चलती रही और धड़ल्ले से निजी एवं डीम्ड विश्वविद्यालयों को मान्यता देती रही। इस हड़बड़ी में शिक्षा की गुणवत्ता की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। वास्तव में कई बार जानबूझकर इन विसंगतियों को नजर अंदाज किया जाता है।


इस पूरी प्रक्रिया में शिक्षा जगत से जुड़े अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध रहती है। अपना मुंह बंद रखने और अवैध रूप से मान्यता देने के लिए शिक्षण संस्थाओं द्वारा इन अधिकारियों को मोटी रकम दी जाती है। इसलिए ऐसे मामलों में जितने दोषी इन फर्जी विश्वविद्यालयों के संचालक हैं, उतनी ही दोषी सरकार और उससे जुड़े अधिकारी भी हैं।


एक बार फिर शिक्षा नीति में बदलाव की कोशिशें हो रही हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हमारे नीति-निर्माता शिक्षा नीति में परिवर्तन करते हुए हड़बड़ी में कुछ ऐसे निर्णय ले रहे हैं, जो शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य को ठेस पहुंचाने वाले हैं। इस दौर में उच्च शिक्षा की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। कहने को तो शिक्षा नीति में काफी बदलाव हुए हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि हम अब भी लीक ही पीट रहे हैं।


आज अनेक शिक्षक नवाचार को बढ़ावा देकर बेहतरीन काम कर रहे हैं, लेकिन यह भी कटु सत्य है कि आज अध्यापक की प्रतिष्ठा लगातार कम हो रही है। शिक्षा जगत में मौजूद इन विसंगतियों के बीच नई शिक्षा नीति में भी एक बार फिर निजी शिक्षण संस्थानों को अनेक तौर-तरीकों से पनपने का मौका दिया गया है। अब समय आ गया है कि सरकार निजीकरण की आड़ में पनपे संदिग्ध विश्वविद्यालयों और अन्य शिक्षण संस्थानों के क्रियाकलापों पर गंभीरता से ध्यान दे, ताकि हजारों छात्रों के भविष्य को अंधकारमय होने से बचाया जा सके।

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