बाजार अर्थव्यवस्थाओं में बाजारों में संकट आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन उन समस्याओं का समाधान बाजार के नियमों से ही संभव हो जाता है। बाजार में कई बार अपेक्षाओं के अंतर से उतार-चढ़ाव आ जाते हैं, लेकिन अंततोगत्वा बाजारी शक्तियां पुनः साम्य स्थापित कर लेती हैं। पर चीन का मामला कुछ अलग है। वहां निजी उद्यम तो हैं, जो पूंजीपतियों द्वारा संचालित हैं, लेकिन बाजार की शक्तियां पूरी तरह प्रभावी नहीं हैं। ऐसे में पिछले दिनों चीन का शेयर बाजार जब गिरना शुरू हुआ, तब चीन सरकार ने आनन-फानन में कई कंपनियों के शेयरों की खरीद-फरोख्त पर रोक लगा दी, ताकि उन शेयरों के भाव ज्यादा न गिर पाएं। ऐसे में शंघाई शेयर बाजार में गिरावट थोड़े समय के लिए रुक गई, लेकिन इससे चीन की अर्थव्यवस्था पर दीर्घकाल में ज्यादा बुरा असर पड़ सकता है।
पिछले ढाई दशकों से भी ज्यादा समय से चीन में पूंजीवाद है। इसके बावजूद सरकार की पकड़ आर्थिक तंत्र पर निरंतर बनी रही। लेकिन केंद्रीय योजना आधारित औद्योगिकीकरण का स्थान चूंकि निजी उद्योगों ने ले लिया था, ऐसे में, सरकारी हस्तक्षेप महसूस तो होता था, पर सामने दिखाई नहीं देता था। विदेशी विनिमय दर सरकार द्वारा ही तय होती, मजदूरी दर, ब्याज दर और यहां तक कि निर्यात कीमत भी सरकारी नियंत्रण में थी। इसलिए उद्योग सरकारी नियंत्रण में न होते हुए भी सरकारी निर्देशन में ही चलते रहे। उसी क्रम में शेयर बाजार में हालिया गिरावट को भी चीन सरकार ने उसी अंदाज में ठीक करने का प्रयास किया। पर ऐसे में विदेशी निवेशक अब भविष्य में वहां निवेश नहीं करना चाहेंगे। अत्यंत नाजुक स्थिति में शेयरों की खरीद-फरोख्त पर रोक लगा दी जाएगी, तो शेयर बाजारों में पोर्टफोलियो निवेशक क्यों आएंगे?
कंपनियों के कार्यकलाप और उनकी वित्तीय स्थिति और कुल मिलाकर शेयर बाजार की जितनी जानकारियां दूसरे मुल्कों में खुले तौर पर उपलब्ध हैं, वैसी स्थिति चीन में नहीं है। नियंत्रित शेयर बाजार या यों कहें कि नियंत्रित व्यवस्था एक बाजार व्यवस्था के समकक्ष कभी नहीं हो सकती। चीन सरकार ने पहले हस्तक्षेप कर शेयरों की कीमत बढ़ाई, फिर उसने अकस्मात युआन का अवमूल्यन कर दिया। पहले चीन की सरकार ने अपनी जिद से युआन को मजबूत बनाए रखा और ऐसे संकेत दिए कि वे युआन को वैश्विक करेंसी बनाना चाहते हैं और अचानक उसमें अवमूल्यन कर दुनिया भर के करेंसी बाजारों में उथल-पुथल मचा दी।
यह बेशक सही है कि चीन ने युआन में लगभग पांच प्रतिशत का ही अवमूल्यन किया है, जो 2008 की मंदी के बाद अमेरिका और इंग्लैंड की करेंसी में अवमूल्यन और जापान में 2012 के बाद हुए येन के अवमूल्यन से खासा कम है। लेकिन जिस प्रकार से युआन को मजबूत बनाए रखा गया था, उसमें थोड़ा भी अवमूल्यन ज्यादा बड़ी उथल-पुथल मचा रहा है। चीन के इस कदम से अन्य मुल्कों को भी अपनी करेंसी का अवमूल्यन करना पड़ रहा है।
खुद चीन के लिए यह कोई बहुत सराहनीय स्थिति नहीं है। हाल-फिलहाल चीन के शेयर बाजार में गिरावट थोड़ी थम गई होगी, मगर दीर्घकाल में चीन को निवेश के प्रवाह की दृष्टि से और अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार की दृष्टि से भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। भूलना नहीं चाहिए कि चीन के इस कदम से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उसकी साख को भी धक्का लगा है।