फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

लेखकों से हिंदी को बचाओ

Tue, 15 Sep 2015 07:59 PM IST
राजेंद्र शर्मा
विज्ञापन
विज्ञापन
आखिर हिंदी के दिन फिरे। दो कम सत्तर साल लग गए, पर दिन फिरे तो सही। आखिकार, किसी ने तो हिंदी की सुध ली। सिर्फ सुध ही नहीं ली, सुकुमारी हिंदी राजकुमारी को, लेखक नामधारी शराबी-कबाबी राक्षसों की कैद से छुड़ाने के लिए, बाकायदा सफेद घोड़े पर सवार राजकुमार पहुंच गया। राजकुमार की ललकार सुनते ही तमाम राक्षस भाग खड़े हुए। आखिरकार शुद्ध प्रेम की विजय हुई। हिंदी के विश्व स्वयंवर में सिर्फ शुद्ध-पवित्र आत्मा, प्रेमी जन रह गए। न लिखें, न बोलें, बस दूर-दूर से हिंदी की पूजा करें। घर में जितनी अंग्रेजी लाएं, उतना ही बाहर हिंदी-हिंदी की गुहार लगाएं।
विज्ञापन


जब विश्व स्वयंवर में राक्षसों से हिंदी की रक्षा कर ली गई, सालाना हिंदी दिवस पर हिंदी की मुक्ति खुद ब खुद हो गई। हिंदी दिवस हर बार से ज्यादा जोरों से मनाया गया। हां, किसी लेखक-वेखक को पास में फटकने भी नहीं दिया। शाल-माला का खर्चा भी बचा और पहली बार शुद्ध अंत:करण से हिंदी की सच्ची पूजा हुई। फाइलों पर हिंदी में दस्तखत करने का मन बनाया गया, सो अलग। सवा-डेढ़ साल में हिंदी की इतनी मुक्ति कम नहीं है। आगे अभी मुक्ति दिलाने का बहुत काम बाकी है। सरकारी समितियों को लेखकों से मुक्त कराना है। पद्म पुरस्कारों को लेखकों से मुक्त कराना है। मीडिया-वीडिया को लेखकों से मुक्त कराना है। शिक्षा को लेखकों से मुक्त कराना है। और सबसे मुश्किल काम-पाठ्यपुस्तकों को लेखकों से मुक्त कराना है। होगा, वह सब भी होगा। नई-नई जीवनियां आ रही हैं। नए-नए आसन आ रहे हैं। नए-नए संस्कार आ रहे हैं। नए-नए प्रवचन आ रहे हैं। जब इतना सब आ चुका है, लेखक-मुक्त किताबें भी अब दूर नहीं हैं। धीरे-धीरे सब होगा। बस देश-विदेश के हिंदी प्रेमी जरा धीरज रखें। जहां इतने साल इंतजार किया, हिंदी की पूर्ण मुक्ति के लिए क्या चंद साल और इंतजार नहीं कर सकते!
विज्ञापन


दुनिया भर के हिंदी-प्रेमियो एक हो। तुम्हारी हिंदी के पास खोने को कुछ भी नहीं है, लेखकों की बेड़ियों के सिवा!
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें