यह एक सामान्य अवधारणा भले हो कि अगर सरकार स्थिर होती है, तो अर्थव्यस्था अच्छी गति ही नहीं पकड़ती, बल्कि दुनिया में अपनी स्थिर साख भी निर्मित करती है। लेकिन क्या पिछले कुछ वर्षों में दुनिया में आर्थिक उथल-पुथल का जो दौर देखा गया, वह इस निष्कर्ष को उचित ठहराता है? संभवतः उत्तर नकारात्मक ही होगा। फिर सवाल उठता है कि आखिर भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने सरकार की स्थिरता की अपेक्षा को किस उद्देश्य से प्रस्तुत किया होगा?
रिजर्व बैंक के गवर्नर ने 2013 की वित्तीय स्थिरता पर अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए 2014 में होने वाले राजनीतिक परिवर्तन पर एक छोटी-सी आशंका जाहिर की थी। उन्होंने इस संभावित परिवर्तन को लेकर कोई निष्कर्ष तो नहीं निकाला, लेकिन यह अपेक्षा अवश्य प्रकट की थी कि भविष्य में बनने वाली सरकार ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिससे दुनिया के समक्ष भारत को लेकर नीतिगत अस्थिरता का संदेश जाने का खतरा हो। कहने का तात्पर्य यह है कि सरकार स्थिर होनी चाहिए। रिजर्व बैंक के गवर्नर की इस सदिच्छा को स्वीकार करने में किसी को कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए, लेकिन क्या वास्तव में सरकार की अस्थिरता ही एकमात्र कारण है, जो भारत में आर्थिक वातावरण के लिए अनुकूलन स्थापित नहीं होने दे पा रहा है। क्या यही वह कारक है, जो भारत को दुनिया के सामने अपने नीतिगत निर्णयों को प्रभावी ढंग से पेश करने से रोकता है?
किसी भी प्रश्न का उपयुक्त जवाब देने के लिए जरूरी है कि पहले यह देखा जाए कि क्या वास्तव में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए दो की सरकार यूपीए एक के मुकाबले अस्थिर रही? सच तो यह है कि दूसरे चरण में न केवल यूपीए गठबंधन मजबूत होकर उभरा था, बल्कि कांग्रेस भी पिछले कार्यकाल के मुकाबले अधिक मजबूत होकर सामने आई थी। पर अर्थव्यवस्था की साख इसी दौर में अर्श से फर्श तक पहुंच गई। हालांकि यह बात केवल भारत के संदर्भ में ही नहीं देखी जा सकती, बल्कि अमेरिका और यूरोप पर भी लागू होती है। गौर करने योग्य बात है कि अमेरिका में जब सब-प्राइम संकट आया था, तब वहां किसी राजनीतिक अस्थिरता का दौर नहीं था। लीमैन ब्रदर्स तथा अमेरिकन इंटरनेशनल ग्रुप (एआईजी) के ढहने के साथ ‘सेकेंड ग्रेट डिप्रेशन’ की जो शुरुआत हुई थी, वह अमेरिकी प्रशासन की अस्थिरता के कारण नहीं हुई थी। यूरोप में ‘पिग्स’ देशों (पुर्तगाल, इटली, ग्रीस और स्पेन) के साथ-साथ कुछ अन्य देशों में भी आर्थिक संकट की दस्तक उन देशों की सरकारों की अस्थिरता के कारण नहीं हुई थी। सवाल यह उठता है कि आखिर वे कौन-सी वजहें हैं, जो अर्थव्यवस्था की साख को बट्टा लगा रही हैं।
इसमें कोई संशय नहीं कि पिछले पांच वर्षों से कभी भी सरकार के समक्ष अस्तित्व का संकट नहीं उत्पन्न हुआ। इसके बावजूद देश की अर्थव्यवस्था में चैतरफा संकट एवं निराशा का वातावरण दिखा। आर्थिक विकास दर केंद्रित आर्थिक नीति होने के बावजूद लड़खड़ा गई, रुपया लंबे समय तक डूबता-उतराता रहा, ट्वीन डेफिसिट अर्थात राजकोषीय घाटे के साथ-साथ चालू खाता घाटा, बेहद नकारात्मक स्थिति में पहुंच गया, जिससे देश के वित्तीय अस्थिरता की ओर जाने का खतरा भी पैदा हुआ। सरकार अधिकांश नीतिगत मोर्चों पर अहम निर्णय लेने में कमजोर दिखी और आर्थिक सुधारों के ठप होने की वजह से अर्थव्यवस्था की साख गिरती गई। फलतः जो निवेशक कुछ समय पहले तक भारत पर दांव लगाने को तैयार थे, वही इससे किनारा करने लगे। यही नहीं भारतीय उद्यमी भी लातिनी अमेरिका तथा अफ्रीका की ओर रुख कर बैठे। दरअसल प्रगतिशील व समृद्ध अर्थव्यवस्था के लिए सरकार का स्थिर होना उतना जरूरी नहीं होता है, जितना सक्षम, दक्ष, पारदर्शी और सुशासन का होना।
असल में चिंता के तीन प्रमुख बिंदु हैं-सरकार की कार्यप्रणाली, राजनीतिक भागीदारी और राजनीतिक संस्कृति। स्वाभाविक है, इससे राजनीतिक-आर्थिक वातावरण में विकृति उत्पन्न हुई और अर्थव्यवस्था की साख गिरी। फिलहाल इसे केवल सरकार की स्थिरता से नहीं सुधरा जा सकता।