आधिकारिक भाषाओं पर संसद की समिति की छह साल पुरानी रिपोर्ट की अधिकांश सिफारिशों को सरकार ने मान लिया है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद हिंदी जानने वाले सांविधानिक पदों पर बैठी शीर्ष हस्तियों के लिए सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिंदी बोलना जरूरी हो गया है। दसवीं तक हिंदी पढ़ाने की अनिवार्यता भी लागू होने की प्रक्रिया में है। जिस विदेश मंत्रालय में सोना, उठना, उबासी लेना तक अंग्रेजी में होने की परिपाटी रही है, उस विदेश मंत्रालय द्वारा बनाए जाने वाले नागरिकता के पहचान चिह्न पासपोर्ट को भी हिंदी में बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए जा चुके हैं। इन कदमों का एक तरफ स्वागत हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ धीमे सुर में विरोध भी होने लगे हैं। पांच दशक पहले हिंदी लागू करने के खिलाफ जिस तरह तमिलनाडु उबला था, शुक्र है कि इस बार वैसा विरोध नहीं हो रहा है। सतह पर विरोध नजर तो नहीं आ रहा है, पर राजभाषा मामलों के प्रभारी किरण रिजिजू का जवाब देना ही विरोध होने का संकेत देता है। उन्होंने कहा है कि हिंदी और आधिकारिक भाषाओं को सरकार थोप नहीं रही, बल्कि उन्हें स्वीकार्य बनाने की कोशिश कर रही है। बेशक संसद की इस समिति ने आधिकारिक भाषाओं के लिए छह साल पहले 117 सिफारिशें की थीं, पर इनमें ज्यादातर सिफारिशें उस हिंदी को लेकर ही हैं, जिसे 15 सितंबर, 1949 को आजाद भारत की राजभाषा बनाने को मंजूरी दी गई थी। पर राजनीति के कुचक्र में हिंदी अपना वह स्थान हासिल करने में पिछड़ी रही।
हिंदी की राह में बाधा 1965 का वह कैबिनेट नोट रहा है, जिसके मुताबिक अगर एक भी राज्य ने हिंदी का विरोध किया, तो उसे राजभाषा के आसन पर नहीं बैठाया जा सकेगा। दिलचस्प यह है कि इस कैबिनेट नोट के ठीक दो साल पहले ही नगालैंड राज्य अस्तित्व में आ चुका था, जिसकी आधिकारिक राजभाषा अंग्रेजी ही है। सवाल यह है कि जिस राज्य की राजभाषा अंग्रेजी हो, वह भला क्योंकर हिंदी को स्वीकार करने लगा। छह साल पहले रही मनमोहन सिंह की अगुआई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने शायद इसी विरोध और हिचक के चलते इन सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया होगा।
यहां यह याद कर लेना जरूरी है कि राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते गांवों और पिछड़े इलाकों के प्रतिभाशाली बच्चों की नि:शुल्क पढ़ाई के लिए नवोदय विद्यालयों का मंच मुहैया कराया था, तो उसे देश के सभी राज्यों ने हाथोंहाथ स्वीकार किया। लेकिन तमिलनाडु ने हिंदी की पढ़ाई की शर्त के चलते ये स्कूल अपने यहां खोलने नहीं दिया। हालांकि तमिलनाडु में भी इस बीच एक वर्ग जरूर पैदा हो गया है, जो यह मानने लगा है कि हिंदी का विरोध करके उसने गलती की।
बेशक अब तमिलनाडु में भी पांच दशक पूर्व वाला कट्टर हिंदी विरोधी माहौल नहीं है, लेकिन राजनीति से सावधान रहना होगा। फिर केंद्र सरकार को यह समझाना भी होगा कि हिंदी या आधिकारिक भाषाओं को बढ़ावा देना हिंदी को लादना नहीं, बल्कि उस राज्य की भाषा को भी तवज्जो देना है। डॉक्टर सत्येंद्र और बनारसी दास चतुर्वेदी की भाषाओं के जनपद की नीति को लोगों तक पहुंचाना होगा। जनपदीय या स्थानीय भाषाओं के विकास के मूल में ही राष्ट्र और भारतीयता का विकास निहित है और हिंदी उन्हें सिर्फ मंच मुहैया करा सकती है। अगर ऐसा हुआ तो तय है कि आधिकारिक भाषाओं को लेकर संसदीय समिति की सिफारिश को सही तरीके से लागू किया जा सकेगा और विरोध के सुर भी शांत हो जाएंगे।