सरकार इन दिनों बहुत असमंजस में है। कुछ समझ नहीं आ रहा। आखिर सत्य क्या है? क्या घोटाले सत्य हैं? क्या बहस सत्य है? क्या इस्तीफा सत्य है? क्या निर्विकार भाव से मौन रहना सत्य है? सत्ता के परम ब्रह्म पद पर रहकर सत्य की खोज इतनी मुश्किल होती है, यह आज ही पता चला है। आरोप के तहत संसद न चलने देना, एक और बहस के लिए तैयार न होना और इस्तीफे की मांग पर अडिग रहना निश्चय ही दुखद है। सरकार दुखी है, जनता दुखी है। कुछ काम नहीं हो पा रहा। कैसे इस देश का विकास होगा? और कैसे देश के अच्छे दिन आएंगे?
सरकार हैरान है! यह कैसा विपक्ष है, जो इतने असहयोग पर उतर आया है! वह शोर-गुल मचा रहा है, संसद नहीं चलने दे रहा, बार-बार इस्तीफे के नारे लगा रहा है। उसकी बस एक ही धुन है, इस्तीफा दे दिया जाए। इस्तीफा कितना हृदय विदारक शब्द है! लगता है, जान ही निकाल देगा। छोटी-छोटी बातों को कितने व्यापम यानी व्यापक रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। ये सामान्य-सी बातें हैं। किसी दुखी आदमी के लिए कोई सिफारिश कर दी, तो इसमें इस्तीफा मांग लेना कहां का न्याय है? लेकिन इस समस्या का आखिर समाधान भी क्या है?
सरकार दुखी है। विपक्ष कह रहा है कि अब कोई मौन न रहे, संसद में आकर बयान दे। भई, क्यों दे? हम आखिर क्या गलत कर रहे हैं? मौन रहने की जो परंपरा 'हाथ' संप्रदाय वालों के मौनी बाबा ने डाली है, हम तो बस उसी का पालन कर रहे हैं। फिर बोलें भी क्या, ऐसी कोई बात तो है नहीं। कोई घोटाला हमको तो नजर नहीं आ रहा। कैग ने अब तक कहां बताया है? घोटाले जैसी कोई बात ही नहीं है।
यह सब विपक्ष के मन का भ्रम है बस। इन भ्रमों की उत्पत्ति भी इसलिए हो रही है, क्योंकि सत्तामय सूर्य की किरणों के अभाव में उनके मन में अंधकार छाया हुआ है। हताशा में ऐसे भ्रम पैदा होते ही हैं, खासकर तब, जब किसी को विपक्ष में रहना पड़े। सो सरकार सत्य तक पहुंच गई है। वह मौन थी, वह मौन है और मौन ही रहेगी। मौन रहना ही जीवन का परम सत्य है।