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भूमि अधिग्रहण से डरते हैं किसान

Sun, 09 Aug 2015 07:57 PM IST
तवलीन सिंह
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जब भी कृषि से जुड़ी किसी समस्या पर लिखना होता है, तब मैं अपने भाई के साथ सलाह-मशविरा करती हूं। मेरे भाई की गिनती बड़े किसानों में होती है, लेकिन खेती से उसको तभी थोड़ा-बहुत पैसा वसूल हुआ, जब करनाल शहर के दिन-ब-दिन फैलते दायरे से उसकी जमीन के कुछ हिस्से शहरी घोषित हुए और अचानक कीमत बढ़ गई। वर्ना गुरबत के बीच गुजरी है मेरे भाई की जिंदगी। एक फसल बर्बाद हो जाए या बेमौसम बारिश हो या ओले पड़ें, तो ऋण के चंगुल में फंस जाने की नौबत आ जाती है।
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मैं अपने भाई से इसलिए भी सलाह-मशविरा करती हूं, क्योंकि भूमि अधिग्रहण कानून के इस विवाद ने मुझे यकीन दिलाया है कि दिल्ली में बैठे राजनीतिक पंडित कृषि की समस्याओं के बारे में नहीं जानते। जो थोड़े-बहुत ग्रामीण पृष्ठभूमि के सांसद हैं, वे भी अपनी बात पूरी तरह रख नहीं पाते। रही बात उन आला अधिकारियों की, जो दिल्ली के आलीशान भवनों में बैठकर करते हैं कृषि नीति की बात, तो उन्हें भी किताबी जानकारी के अलावा कोई ज्ञान ही नहीं होता।

संभवतः इसीलिए मनमोहन सिंह सरकार ने ऐसा भूमि अधिग्रहण कानून दिया, जिसके तहत जमीन की खरीदारी का सिलसिला कम से कम पांच वर्ष चलेगा, अगर कोई अदालत के दरवाजे न खटखटाए इस बीच। इससे न तो विकास की संभावना नजर आती है, न ही किसान को फायदा होने की उम्मीद है।
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मैंने जब अपने भाई से पूछा इस कानून के बारे में, तो उसने सवाल में जवाब दिया, अधिग्रहण की जरूरत क्या है? उसने कहा, इस देश के नब्बे प्रतिशत किसान ऐसे हैं, जिनके खेत एक या डेढ़ एकड़ से ज्यादा नहीं हैं। इस टुकड़े भर जमीन पर खेती करके मुनाफा कमाना असंभव है। सो किसान अपनी जमीनें ठेके पर देते हैं। आप इन गरीब किसानों को ठेके से थोड़ा ज्यादा पैसे दे दें, और वे खुशी-खुशी जमीनें आपके हवाले कर देंगे। इससे भी ज्यादा खुश होंगे वे अगर विकास की यात्रा में उनके लिए भी आप कोई हिस्सा रखें। अधिग्रहण शब्द से किसान डरते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि सरकारी अधिकारी उन्हें हमेशा धोखा देने का काम करते हैं।

जब से नरेंद्र मोदी की सरकार बनी है, तब से इस कानून को लेकर विवाद है। बार-बार अध्यादेश द्वारा इसमें तब्दीली लाने की कोशिश हुई, लेकिन विवाद बढ़ता गया, खासकर इसलिए, क्योंकि राहुल गांधी ने इन दिनों किसानों के मसीहा का रूप धारण किया है। अब भूमि अधिग्रहण का अधिकार राज्य सरकारों के हाथों में दिया जाएगा। यह बहुत अच्छी बात है, क्योंकि कृषि क्षेत्र में जितना विकेंद्रीकरण होगा, उतना ही भला होगा किसानों का। मेरे भाई का कहना है कि विकेंद्रीकरण होने से राज्य स्तर के जो कृषि विकास संस्थान हैं, उनकी काबिलियत बढ़ जाएगी। कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा नए उत्पाद आएंगे, नए बीज, खेती के नए तरीके आएंगे। राज्य सरकारों के बीच जब विकास की स्पर्धा शुरू होगी, तब बेहतर व्यवस्था भी कायम होगी। वर्तमान स्थिति यह है कि कृषि क्षेत्र के तकरीबन आधे उत्पाद बेकार जाते हैं सिर्फ इसलिए कि कोल्ड स्टोरेज का गंभीर अभाव होने के कारण सब्जियों, फलों, फूलों की फसलें बर्बाद हो जाती हैं।

क्या इन पर कभी आपने संसद में बहस सुनी है? थोड़ी ईमानदारी से खोज की होती हमने, तो स्पष्ट हो जाता कि आत्महत्याओं का मुख्य कारण ऋण का बोझ है, गुरबत नहीं।
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