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पर्यावरण : कोई नदियों की चीख क्यों नहीं सुनता, कान बंद करने से सूखती रहेगी गोमती

सुधीर विद्यार्थी
Updated Thu, 12 Jun 2025 07:26 AM IST

सार

इटली में ब्रेंता नदी को ऐतिहासिकता की रक्षा करते हुए जिस तरह से संभाला गया है, उससे काफी कुछ सीखा जा सकता है।
 
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : freepic


पीलीभीत से 30 किलोमीटर दूर गोमती के उद्गम की ओर जाते हुए रास्ते में ऊंचे साल वृक्ष, जगह-जगह किसी मूर्ति शिल्प-से दीमकों के बनाए मिट्टी के घर, शांत बहती माला नदी की धारा और लहराते बांसों की हरीतिमा। मुझे कवि श्रीनरेश मेहता की कविता की पंक्ति याद आती है-गोमती तट पर/दूर पेंसिल रेख-सा वह बांस का झुरमुट।


आसमान में तपते सूरज के नीचे इस नदी की शीतल जलधारा को खोजना अब मृगमरीचिका जैसा है। लखनऊ शहर के आगे सुल्तानपुर और जौनपुर तक इसका बहाव देखना उन सबके लिए पीड़ादायक है, जो नदियों को आज भी प्यार करते हैं। कई वर्ष पहले मूल भारतवंशी नीदरलैंड निवासी भगवान खुनखुन ने जब लखनऊ पहुंचकर गोमती को देखना चाहा, तो वहां के निवासी मुंह चुराने लगे। पूछा था उन्होंने, ‘गोमती हियां ही है ना, कैसा करत हैं आप रीवर की देखभाल?’ पर खुनखुन को कोई उत्तर नहीं मिलता। वह भावाकुल होकर कहते हैं, ‘मथवा त छुआव लेई.....अंजुरी से परनाम कर लेई।’


भगवान खुनखुन के पिता महादेव खुनखुन की कविताओं में गोमती नदी का जिक्र आया है। लेकिन आज की यह गोमती हमारे जीवन और कविता से दूर होती जा रही है। हम नदियों की पूजा तो करते हैं, लेकिन उन्हें प्यार नहीं करते। उन्हें प्रदूषण से मुक्त रखने की चिंता हमारे भीतर नहीं है। बहती यमुना को हमने इतना बांध दिया है कि दिल्ली में वह गंदे नाले से भी बदतर बन चुकी है।


हमारी दूसरी छोटी-बड़ी नदियां भी शहरीकरण और विकास के इसी दुष्परिणाम को भुगत रही हैं। इंग्लैंड की टेम्स नदी भी कभी प्रदूषण की इसी मार को झेल रही थी, लेकिन वहां के नगर निगम और नागरिकों ने उसे पुनर्जीवन देने का संकल्प लिया और वे अपने प्रयासों से उस नदी की पुरानी गरिमा को फिर से लौटा लाए। क्या हम नदियों के प्रति इतने भी संवेदनशील नहीं हो सकते?


मुझे याद आता है कि कुछ वर्ष पहले हिंदी के कवि केदारनाथ सिंह इटली यात्रा पर गए थे, जहां उन्होंने एक पुस्तिका ए गाइड टु ब्रेंता रिवर पलटते हुए जाना कि वहां बहने वाली एक क्षीणकाय नदी ब्रेंता का अंग्रेजी के रोमांटिक कवि लार्ड बायरन से भी एक रिश्ता है। बायरन इस ब्रेंता नदी के किनारे कुछ ही किलोमीटर दूर एक छोटे-से शहर मीरा में थोड़े समय तक ठहरे थे और अपनी दो प्रसिद्ध कृतियों के महत्वपूर्ण अंश पूरे किए थे।


नदी के लंबे इतिहास के स्मृति-लोक में एक विदेशी कवि का नाम भी उसी तरह सुरक्षित था, जैसे उसके तट पर होने वाले युद्धों तथा अन्य बड़ी घटनाओं के।...सड़क बिल्कुल ब्रेंता नदी के पास से गुजर रही है। जितनी चौड़ी सड़क, उतनी ही चौड़ी नदी। पर कहीं गंदगी नहीं। शीशे-सा चमकता ब्रेंता का सौंदर्य। इस कवि को इटली की धरती पर यह एहसास हुआ कि नदियों को सिर्फ श्रद्धा से नहीं, गहरे प्यार से बचाया जा सकता है। ब्रेंता की पूरी ऐतिहासिकता की रक्षा करते हुए वहां के लोगों और स्थानीय संस्थाओं ने जिस तरह जल-प्रवाह के क्षीण होते जाने के बावजूद उसे संभाल कर रखा है, उससे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।
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उल्लेखनीय है कि महाकवि गेटे जब वेनिस आए, तो इसी नदी के मार्ग से होकर आए थे। उसके तटों के सौंदर्य का उल्लेख उन्होंने अपने संस्मरणों में खास तौर पर किया है। हम सोचते हैं कि क्या हमारी स्मृति में अपनी नदियों के साथ उन कवियों, कलाकारों का नाम भी उसी तरह सुरक्षित है, जैसे ब्रेंता के साथ गेटे या बायरन का। मैं गोमती के उदास उद्गम-स्थल पर खड़ा केदारनाथ सिंह की आंखों से बार-बार ब्रेंता के उस दृश्य को याद करता हूं, जहां उस नदी के तट पर हरी घास के बीच एक युवा स्त्री की पूरे कद की प्रतिमा स्थापित है। मुझे अपने चाचा की याद आती है, जब वह नहाने के लिए कुएं से जल भर कर पहला लोटा सिर पर उड़ेलते थे, तो हर बार यही शब्द बोलते--हर हर गंगा भगवती, पाप काटैं गोमती...हास्य अभिनेता राजपाल यादव ने गोमती के पाप काटने के लिए अब एक दीर्घ मुक्ति अभियान की घोषणा की है।

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