बेचारे नाथूराम गोडसे से मिस्टेक हो गई थी। इतने वर्षों बाद पता चला है कि गोडसे ने गलत आदमी पर गोली चलाई थी। खैर! हो जाती है इंसान से गलती कभी-कभी। हम तो कहते हैं कि गलती इंसान से ही होती है। इसीलिए तो मनुष्य को गलतियों का पुतला कहा गया है।
वैसे हम गोडसे को गलतियों का पुतला नहीं कह रहे। बेचारे को ज्यादा गलतियां करने का मौका ही कहां दिया गया? पहली गलती पर ही उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। पर जो हुआ, सो हुआ। अब अच्छे दिन आने वाले हैं। इतिहास के भी और गोडसे के भी।
यह ठीक है कि गोडसे को महात्मा पर गोली नहीं चलानी चाहिए थी। लेकिन यह भी समझना चाहिए कि गोडसे से गलती हुई। गोडसे के साथ ऐसा अन्याय अब ज्यादा चलने वाला नहीं है। देश के दक्षिणी सिरे से इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठनी शुरू भी हो चुकी है। खाकी पार्टी के एक नेता ने तो बाकायदा अखबार में लिखकर इसका ऐलान भी कर दिया है। नए राज में नया इतिहास लिखा जाएगा।
आखिर कब तक गोडसे को गांधी के हत्यारे के तौर पर प्रचारित करने दिया जा सकता है? गोडसे ने तो तीन गोलियों में कुछ ही पल में गांधी की हत्या कर दी थी। पर नेहरू जी की नीतियों ने क्या उन्हें कम मर्माहत किया? आखिर गांधी जी ने कांग्रेस को खत्म कर देने का सुझाव दिया ही था।
कांग्रेसियों ने उस पर अमल न करके क्या महात्मा का दिल नहीं दुखाया था? ऐसे में, नेहरू जी को महिमामंडित करने का सिलसिला नहीं चलने वाला। माननीय दीनानाथ बत्रा जी के रहते हुए ऐसा झूठा इतिहास तो कतई सहन नहीं किया जा सकता।
कोई कैसे भूल सकता है कि गांधी जी हत्या के जुर्म में गोडसे को फांसी तो हुई ही, इस चक्कर में बेचारे संघ पर पाबंदी और लग गई। और पाबंदी भी लगी उनके अपने ही सरदार के हाथों! हम पक्के तौर पर शायद अब कभी नहीं जान पाएंगे कि गोड्से ने महात्मा को गोली क्यों मारी, लेकिन दशकों के बाद ही सही, इतिहास की गलती दुरुस्त तो की ही जा सकती है। यानी अब इतिहास के भी अच्छे दिन आने वाले हैं।