रब्बाई (यहूदी पुजारी) को किसी काम से कुछ दिनों के लिए शहर से दूर जाना पड़ा। उसके परिवार में पत्नी और दो बच्चे थे। वह शहर से बाहर था, उसी दौरान एक दुर्घटना में उसके दोनों पुत्र मारे गए। पत्नी ने खुद को संभाला और यह बात पति तक नहीं पहुंचने दी। रब्बाई का ईश्वर में अटूट विश्वास था, पर वह दिल का मरीज था।
पत्नी को आशंका थी कि वह इस हादसे के बारे में सुनेगा, तो सदमा झेल नहीं पाएगा। खैर, काम पूरा कर पति वापस लौटा। वह पत्नी से गर्मजोशी से मिला और बच्चों के बारे में पूछा। पत्नी ने कहा, उनकी चिंता मत कीजिए। आप नहा-धोकर आराम कीजिए।
कुछ समय के बाद वे भोजन के लिए बैठे। पत्नी ने उससे यात्रा के बारे में पूछा। रब्बाई ने उसे सब बताया और बच्चों के बारे में पूछा। पत्नी ने कहा उनकी बात बाद में करेंगे। मैं किसी और उलझन में हूं, पहले आप मुझे उसका उपाय बताइए।
रब्बाई ने हामी भरी, तो पत्नी ने कहा, आप जब बाहर थे, तब हमारे एक मित्र ने मुझे दो बेशकीमती नगीने सहेजकर रखने के लिए दिए। अब मैं उन्हें लौटाना नहीं चाहती। रब्बाई ने आश्चर्य से कहा कि तुम कैसी बातें कर रही हो? तुम तो ऐसी नहीं थीं? पत्नी बोली, सच यही है कि मैं उन्हें अपने से दूर होते नहीं देखना चाहती।
अगर मैं उन्हें अपने पास रख सकूं, तो इसमें क्या बुरा है? रब्बाई ने कहा, जो हमारा है ही नहीं, उसे अपने पास रखना तो उन्हें चुराना ही होगा न? हम उन्हें लौटा देंगे और मैं कोशिश करूंगा कि तुम्हें उनसे बिछुड़ने का अफसोस न सताए।
पत्नी ने कहा, ठीक है, जैसा आप चाहें। हम वह लौटा देंगे, और सच यह है कि हमने उन्हें लौटा दिया है। हमारे बच्चे ही वे बेशकीमती नगीने थे। ईश्वर ने उन्हें सहेजने के लिए हमें दिया था। उसने उन्हें हमसे वापस ले लिया। वे जा चुके हैं।