ओबामा प्रशासन इस्लामिक स्टेट के प्रचार तंत्र से निपटने की अपनी रणनीति पर फिर से विचार कर रहा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह आतंकी समूह नई भर्तियों, आर्थिक संसाधन जुटाने और वैश्विक रूप से कुख्यात होने के मामले में अमेरिका और उसके सहयोगियों के उसके खिलाफ चलाए जा रहे अभियान से कहीं अधिक प्रभावी साबित हो रहा है। नई रणनीति के तहत विदेश विभाग के अंतर्गत आने वाले सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक काउंटरटेरेरिज्म कम्युनिकेशंस का विस्तार किया जा रहा है, ताकि पेंटागन, आंतरिक सुरक्षा और खुफिया विभाग के प्रचार तंत्र को और अधिक मजबूती दी जा सके। यह केंद्र विदेशी सहयोगियों, गैर सरकारी संगठनों के साथ ही प्रमुख मुस्लिम विद्वानों और इस्लामिक स्टेट का विरोध करने वाले इस्लामिक नेताओं के साथ भी समन्वय कर संदेशों को प्रसारित करने की योजना बना रहा है।
इस्लामिक स्टेट (आईएस) और उसके समर्थक रोजाना ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया के जरिये 90,000 से अधिक संदेश प्रसारित करते हैं। अमेरिकी अधिकारी मानते हैं कि आईएस की यह डिजिटल चुनौती अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा हवाई हमले के जरिये इराक और सीरिया में जमीनी स्तर पर उसके विस्तार को रोकने से कहीं अधिक बड़ी साबित हो रही है।
पब्लिक डिप्लोमैसी और पब्लिक अफेयर्स विभाग के उप सचिव रिचर्ड ए स्टेंगल कहते हैं, हम सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर नए संदेश प्रसारित करने के मामले में उनसे पिछड़ रहे हैं, लिहाजा हमारे पास उनसे मुकाबला करने का एक ही तरीका यह है कि हम सोशल मीडिया पर उपलब्ध अपने संदेशों को अधिक से अधिक प्रसारित करें। वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, ह्वाइट हाउस की पहल पर हिंसक चरमपंथ से मुकाबले की व्यापक रूपरेखा तैयार करने के लिए विशेष बैठक आयोजित की गई है। यह बैठक पेरिस, कोपेनहेगन और डेनमार्क में हुए चरमपंथी हमलों की पृष्ठभूमि में हो रही है। राष्ट्रपति ओबामा के निर्देश पर 2011 में सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक काउंटरटेरेरिज्म कम्युनिकेशंस का गठन चरमपंथी समूहों के खिलाफ काउंटर मेसेजिंग यानी संदेशों के जरिये जवाब देने के लिए किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य आतंकवाद विरोधी माहौल तैयार करना था। इसमें अरबी, उर्दू, पंजाबी और सोमाली भाषाएं जानने वाले डिजिटल विशेषज्ञों को जोड़ा गया, ताकि चरपंथियों के दुष्प्रचार का तुरंत ही इंटरनेट पर जवाब दिया जा सके। ये विशेषज्ञ जेहादियों द्वारा भर्ती, धन उगाही और अपने मंसूबों को प्रचारित करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली अंग्रेजी वेबसाइट्स पर भी आतंकवाद विरोधी संदेश पोस्ट करते हैं।
इस ऑनलाइन मेसेजिंग का मकसद चरमपंथियों के भावनात्मक असर को कम करना है, ताकि युवा यह सोचने को विवश हों कि उन्हें हिंसक चरमपंथ से जुड़ना चाहिए या नहीं। मसलन, दो वर्ष पूर्व एक संदेश के साथ तीन अमेरिकी व्यक्तियों की तस्वीर दी गई थी, जो सोमालिया गए थे और जहां वे मारे गए। उनमें अलबामा का एक युवक उमर हम्मामी भी था, जो कुख्यात इस्लामिक आतंकी बन गया था। तस्वीर के साथ संदेश था, 'ये लोग जेहाद के लिए आए थे, लेकिन उन्हें अल शबाब ने मार डाला।' एक अन्य तस्वीर में एक युवक ताबूत के पास बैठा रोते हुए दिखा। उसके नीचे संदेश था, 'आखिर किसी निर्दोष की हत्या के रास्ते को सही कैसे ठहराया जा सकता है?' ऐसी हर पोस्ट के साथ चेतावनी होती है, 'फिर से सोचो। लौट आओ।'
पिछले वर्ष जून में इस्लामिक स्टेट के समर्थकों ने अपने उग्रवादियों को चेतावनी दी कि वह सेंटर के ट्विटर अकाउंट से सावधान रहे और उसके साथ किसी तरह का संवाद न करे। टाइम पत्रिका के पूर्व प्रबंध संपादक स्टेनगेल कहते हैं, इस्लामिक स्टेट के खिलाफ नए अभियान में अनेक व्यावसायिक संस्थानों और व्यक्तियों को जोड़ा जा रहा है, ताकि वे ट्विटर पर संदेशों, समाचारों और विचारों को हाइपरटैक्स्ट लिंक से साथ साझा कर सकें। इससे चरमपंथ विरोधी ऑनलाइन कंटेंट को बढ़ाया जा सकेगा। इसके लिए विदेश विभाग के 350 से अधिक ट्विटर अकाउंट का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें दूतावासों, वाणिज्यिक दूतावासों, मीडिया केंद्रों, ब्यूरो और व्यक्तिगत अकाउंट भी शामिल हैं। विदेश विभाग ने पेरिस में कार्टून पत्रिका शार्ली एबदो पर हुए आतंकी हमले की निंदा की इसी नेटवर्क के जरिये झड़ी लगा दी थी।
हालांकि स्टेनेगल कहते हैं कि ये लोग सोशल मीडिया पर बहुत सक्रिय नहीं हैं और उन्हें वहां परास्त करना मुश्किल नहीं। असल में इस सेंटर को जैसी तवज्जो मिलनी चाहिए, वैसी अब तक नहीं मिली। ह्वाइट हाउस और विदेश विभाग से सेंटर को पर्याप्त वित्तीय मदद नहीं मिली है। इस सेंटर के अप्रैल में सेवानिवृत्त हो रहे प्रमुख अल्बर्टो फर्नांडीज ने इस पर कुछ भी टिप्पणी करने से इन्कार कर दिया। उनकी जगह नए निदेशक बन रहे राशद हुसैन एक अमेरिकी मुस्लिम हैं और ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन में ह्वाइट हाउस के विशेष दूत रह चुके हैं।
नई योजना के तहत डिजिटल प्रचार से जुड़ी टीम पहले की तरह काम करती रहेगी, लेकिन नए सेंटर को इन्फर्मेशन को-ऑर्डिनेशन सेल के नाम से जाना जाएगा, जो पेंटागन के विशेषज्ञों और अन्य लोगों के साथ समन्वय करेगा। इससे जुड़े अधिकारी कहते हैं कि इस केंद्र में यों तो कम लोग होंगे, लेकिन इसे ऐसा नेटवर्क बनाने की जरूरत है, जो कि बाकी तमाम नेटवर्क को जोड़ सके और प्रभावी तरीके से आतंकी हिंसा को फैलने से रोका जा सके।