अक्षरों में खुदा दिखाई दे,
अब मुझे ऐसी रोशनाई दे |
पिता के हौसलों का दे बिस्तर,
मां के आशीष की रजाई दे |
हाथ खोलूं तो बस दुआ मांगूं
सिर्फ इतनी मुझे कमाई दे |
रोशनी हर चिराग में भर दूं,
कोई ऐसी दियासलाई दे |
मां के हाथों का स्वाद हो जिसमें,
ले ले सब कुछ वही मिठाई दे |
धूप तो शहर वाली दे दी है,
गांव वाली बरफ मलाई दे |
बेटियों को दे खूब आजादी ,
साथ थोड़ी उन्हें हयाई दे |
तल्ख लहजा तमाम लोगों को,
मीर दे मीर की रुबाई दे ।
दर्द होरी सा दे रहा है तो,
साथ धनिया सी एक लुगाई दे |
घूस के सौ दहेज से बेहतर,
अपने हाथों बनी चटाई दे |
--अभिनव अरुण
सरल शब्दों में अपनी बात कहने वाले अभिनव का रचना संसार अनुभव के आकाश पर आकार लेता है, इसलिए इनको पढ़ते हुए अक्सर खुद की याद आती है। वाराणसी में रहते हैं।