अनुवाद-युगांक धीर, वाणी प्रकाशन, 100 रुपए
अपनी सादगी और ईमानदारी के कारण स्वर्गीय अवतार किशन हंगल की आत्मकथा सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है। अमूमन फिल्म से जुड़ी शख्सियतों के किस्सों में उनके आभामंडल के ब्योरे ही ज्यादा होते हैं। लेकिन यह देखना बहुत आश्चर्यजनक है कि ए.के.हंगल की जिंदगी की कहानी में उनकी अभिनय यात्रा का हिस्सा बहुत कम है; इसे उन्होंने अपने जीवन का एक पड़ाव भर माना है। स्यालकोट में पैदा हुए और पेशावर में पले-बढ़े अवतार को स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन ने जल्दी ही आकर्षित कर लिया था।
उन्होंने अपने बालपन की दो घटनाओं का जिक्र भी किया है-पेशावर में स्कूल के सामने वाली सड़क पर लाल कुर्ते में पठान किसानों का एक जुलूस देखा था, जिसका नेतृत्व खान अब्दुल गफ्फार खान कर रहे थे। इसी तरह किस्सा-ख्वानी बाजार में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ हुए एक जलसे में गढ़वाल रेजिमेंट के सिपाहियों ने, जिसका नेतृत्व चंद्र सिंह गढ़वाली कर रहे थे, ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा गोली चलाने के आदेश की अनदेखी कर दी थी। तब छोटे अवतार ने भी कुछ पत्थर उठाकर गोरों की ओर फेंके थे।
अलबत्ता ए.के.हंगल के भीतर का कम्युनिस्ट सशस्त्र संघर्ष में नहीं, बल्कि वाम वैचारिकता को अपनाने में विश्वास करता था। सुदूर पेशावर में रह रहे इस कश्मीरी ब्राह्मण परिवार के कई लोग सरकारी नौकरी में ऊंचे ओहदे पर थे। लेकिन सिफारिश के जरिये नौकरी लेने के बजाय उन्होंने टेलरिंग का पेशा अपनाना ज्यादा मुनासिब समझा, गोकि उस फैसले के पीछे गरीबी नहीं, बल्कि सुखद भविष्य का सपना था। इस किताब में उनके जीवन के कई रूप देखने को मिलते हैं। एक हंगल वह हैं, जो कारीगरों की यूनियन बनाने के लिए संघर्ष करता है और इसकी कीमत अपनी नौकरी खोने के रूप में चुकाता है।
एक हंगल वह हैं, जो आजादी के आंदोलन के बाद नाविक विद्रोह, संयुक्त महाराष्ट्र के आंदोलन और गोवा मुक्ति आंदोलन में भाग लेता है और रजनी पामदत्त व इंद्रकुमार गुजराल जैसी शख्सियतों से मिलता है। बचपन से अभिनय करते एक तीसरे हंगल भी हैं, जो कराची में हार्मोनिका क्लब स्थापित करते हैं और यथार्थवादी अभिनय की ओर मुड़ते हैं।
इस लिहाज से देखें, तो रंगमंच कलाकार ए. के. हंगल रुपहले पर्दे के चरित्र अभिनेता की तुलना में ज्यादा सशक्त हैं, क्योंकि वहां सामाजिक बदलाव की ज्यादा गुंजाइश है। मौत उनके जीवन में लगातार अंतराल के बाद आती रहती है, इसके बावजूद यह आदमी टूटता नहीं है। गरीबी और संघर्ष के उनके चित्रों का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इनमें व्यवस्था से कोई शिकायत नहीं है। कम्युनिस्ट होने की सजा उन्होंने पाकिस्तान की जेल में तीन साल काटकर चुकाई। फिर मुंबई में शुरुआती डेढ़ दशक उन्होंने परेल की एक चाल में काटे, जहां पानी की किल्लत थी। यहां इप्टा से जुड़ाव अंततः उन्हें फिल्मों की ओर ले गया।
हिंदी सिनेमा में भद्र पुरुष की सबसे प्रामाणिक छवि तो उन्होंने गढ़ी ही, 'शोले' के अंधे इमाम के किरदार में, 'इतना सन्नाटा क्यों है भाई' जैसे संक्षिप्त संवाद में उनका मर्मस्पर्शी अभिनय इतिहास बन गया। युगांक धीर द्वारा अनूदित इस किताब में दो विसंगतियां दिखती हैं। एक तो पेशावर से कराची पहुंचे ए.के.हंगल के परिवार को स्टेशन पर लेने उनका जो साला आता है, उसकी मुस्लिम पत्नी के बारे में बताया जाता है। फिर बहुत बाद में इसका जिक्र है कि उनके साले ने एक मुस्लिम लड़की से शादी कर ली। फोक को फोल्क और एमेट्यर को अमेटर लिखना भी खटकता है।