फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आखिर क्या बताना चाहते थे जनरल सिंह!

Thu, 27 Feb 2014 06:17 PM IST
शिवदान सिंह
विज्ञापन
विज्ञापन
भारतीय सेना को एक बार फिर विवादों में खींचने का प्रयास किया गया। 15-16 जनवरी, 2012 की दरम्यानी रात हिसार छावनी व आगरा से सेना की एक बख्तरबंद यूनिट व पैरा बटालियन का दिल्ली की ओर कथित कूच इस विवाद के केंद्र में है। उस समय के डीजीएमओ जनरल ए के चौधरी ने इसे सेना व सरकार के बीच विश्वास की कमी का नतीजा बताया है। उस समय तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वी के सिंह सरकार के विरुद्ध अपनी उम्र को लेकर उपजे विवाद के कारण उच्चतम न्यायालय चले गए थे। असल में जिस रात यह घटना हुई थी, उसके एक-दो दिन के भीतर ही इस मामले में सुनवाई होनी थी। कोई घटना अकेले इतना महत्व नहीं रखती, जितना उसे परिस्थितियां गंभीर या हलका बना देती हैं। यह जगजाहिर है कि उस समय सरकार और सेना प्रमुख के रिश्ते कितने तल्ख हो गए थे। उस वक्त सरकार की ओर से वरिष्ठ मंत्री प्रणब मुखर्जी ने जनरल सिंह को समझाने की नाकाम कोशिश की। मगर जनरल सिंह ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था।
विज्ञापन


सेना प्रमुख के साथ विवाद चल रहा हो, तब इस प्रकार अचानक सेना की टुकड़ियों का कूच किसी भी सरकार के परेशान होने के लिए काफी है। यों भी हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में सेना परोक्ष या अपरोक्ष तरीके से सरकार पर दबाव बनाती रही है। जब भी विश्व में कहीं भी सेना ने विद्रोह किया है, वहां इसी प्रकार की यूनिटों का प्रयोग किया गया है, यानी बख्तरबंद व पैरा बटालियन। 80 के दशक में मालदीव में जब वहां की सरकार को खतरा था, तब भारत ने इसी बटालियन को भेजा था। मगर यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि भारतीय सेना अराजनीतिक होने के साथ ही देश को समर्पित और चुनी हुई सरकार की वफादार है। लेकिन यदि उस रात मामूली-सी भी अनहोनी हो जाती, तो पूरा देश आईबी और पूरे खुफिया तंत्र को उसी तरह बदनाम करता, जिस प्रकार शेख मुजीबुर्रहान की निमर्म हत्या और कारगिल में हुई घुसपैठ के समय किया गया था।

हमें सबसे पहले यह समझना चाहिए कि जनरल वी के सिंह का यह विवाद इतना बढ़ा क्यों। इसका कारण है, सेना के सारे व्यक्तिगत रिकॉर्ड सेना के पास ही होना। जनरल सिंह 1970 से 2007 तक अपनी सालाना रिपोर्ट में अपना जन्मवर्ष 1950 ही दर्ज कर रहे थे, क्योंकि उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में यही उम्र दर्ज की थी। 2007 में पूरे 37 साल बाद वह इसे 1951 करना चाह रहे थे, जिससे उन्हें एक साल और सेवाकाल मिल जाए। एक आम नागरिक इसे एक छोटी-मोटी भूल समझकर कहेगा कि उम्र विवाद 10वीं क्लास के अनुसार सुलझाना चाहिए था। मैं खुद सेना में रहा हूं, और दावे से कह सकता हूं कि सैनिक कानून के अनुसार यह एक गंभीर मामला है। भर्ती के समय सेना में न्यूनतम आयु सीमा भी होती है और कुछ लोग इस न्यूनतम सीमा को पूरा करने के लिए अपनी जन्मतिथि को आगे-पीछे करके प्रवेश पाने की कोशिश करते हैं, और इसी वजह से सेना कानून की धारा 43 के अनुसार, भर्ती के समय गलत उम्र दर्शाने के आरोप में एक सैनिक को पांच वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। होना तो चाहिए था कि इस विवाद को सैनिक कानून के अनुसार निपटाया जाता, लेकिन सेना प्रमुख के मामले में ऐसी हिमाकत कौन करता?
विज्ञापन


इस अप्रिय विवाद की वजह से जिस सेना को देश में विवादों से ऊपर माना जाता है, वहां लोग जाने-अनजाने अपनी राय देते नजर आए। इससे पूर्व एनडीए के शासनकाल में तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज ने तत्कालीन नौसेना अध्यक्ष एडमिरल विष्णु भागवत को उनकी जगह दिखाई थी। वह एक उचित व मजबूत सरकार का उदाहरण था। मगर इस मामले में मौजूदा सरकार ने टालने वाला रवैया ही अख्तियार किया। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि भविष्य में देश में ऐसी परिस्थितियां न बनें कि सेना और सरकार के बीच मतभेद उभरें।

आईएनएस सिंधुरत्न पनडुब्बी में हुए हादसे के बाद नौसेना प्रमुख एडमिरल डी के जोशी ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफा दे दिया है, जबकि ऐसे हादसों के लिए वह सीधे जिम्मेदार नहीं कहे जा सकते। वास्तव में जनरल सिंह को भी सर्वोच्च अदालत द्वारा जन्म के विवाद के फैसले के बाद नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए था।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें