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अर्थव्यवस्था: बेरोजगारी भत्ता नहीं रोजगार दीजिए, वरना बिगड़ जाएगा आर्थिक संतुलन

मधुरेंद्र सिन्हा
Updated Thu, 01 Jun 2023 07:22 AM IST

सार

कर्नाटक में कांग्रेस ने बेरोजगारी भत्ता देने का वादा किया है, लेकिन ऐसे वादों को पूरा करने में राज्य का आर्थिक संतुलन बिगड़ जाएगा।
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सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया


दरअसल नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने यह सुझाव दिया था कि हर बेरोजगार को कम से कम 2,500 रुपये भत्ता मिलना चाहिए। लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने यह फॉर्मूला विधानसभा चुनाव में चलाया और यह लोकप्रिय हो गया। पर कांग्रेस ने अभिजीत बनर्जी के सुझाव का वह हिस्सा गायब कर दिया, जिसमें उन्होंने राजस्व अनुशासन की बात कही। उन्होंने नए टैक्स लगाने की भी बात कही और कुछ टैक्स बढ़ाने की भी बात की थी। लेकिन कांग्रेस ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। मुफ्त की बिजली-भत्ता वगैरह को मिलाकर राज्य के कोष पर लगभग 54,000 करोड़ रुपये का भार पड़ेगा। 5.4 लाख करोड़ रुपये के कर्ज से दबे कर्नाटक को अब यह भार भी सहना पड़ेगा। इस कर्ज के ब्याज को चुकाने पर इस साल राज्य को लगभग 35,000 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। यह सारा पैसा कहां से आएगा, इस बारे में सरकार खामोश है।


कर्नाटक में अन्य राज्यों की तुलना में बेरोजगारी कम है। फिक्की की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वहां मार्च, 2023 में बेरोजगारी दर 2.7 फीसदी थी, जो देश के औसत 4.2 फीसदी से कम है। फिर भी यह संख्या बहुत है।


इससे अच्छा है कि रोजगार बढ़ाने के कार्यक्रमों पर जोर दिया जाए। समस्या यह है कि सातवें वेतन आयोग ने देश में सरकारी नौकरियां सृजित करने पर कुठराघात किया है। सरकारी कर्मचारियों तथा अन्य के वेतन इतने ज्यादा हो गए हैं कि उन सरकारों के बजट पर भारी बोझ आ गया है, जिन्होंने इसे मंजूर कर लिया है। कर्नाटक में इस साल के अंत तक सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू हो जाएगी, क्योंकि कर्नाटक सरकार ने इसे राज्य में लागू करने के लिए आयोग की समिति को 16 नवंबर तक की अवधि दी है। कर्नाटक में इसे लागू करने के बाद सरकार के खर्च में 12 से 18,000 करोड़ रुपये का इजाफा हो जाएगा। वहां के ढाई लाख से भी ज्यादा सरकारी कर्मचारियों के लिए यह शानदार तोहफा होगा, पर वे इससे ही खुश नहीं हैं, पुरानी पेंशन की भी मांग कर रहे हैं। यह पेंशन व्यवस्था अवकाश प्राप्त लाखों सरकारी कर्मचारियों को मलाई खिलाने जैसी है, जिसमें बड़े अफसरों को प्रति व्यक्ति लाखों रुपये महीना तक मिल सकता है। जाहिर है, ऐसी बढ़िया स्थिति हर कोई चाहेगा। कांग्रेस ने सरकारी कर्मचारियों के इस लालच का फायदा हिमाचल प्रदेश में भी खूब उठाया है।


कर्नाटक में सरकारी खर्च में भारी बढ़ोतरी हो जाने के बाद जाहिर है कि सरकारी पदों पर नियुक्तियां प्रभावित हो जाएंगी। वहां के कर्मचारी यूनियन का कहना है कि राज्य में 39 फीसदी पद यानी लगभग दो लाख से भी ज्यादा पद रिक्त हैं, जिस कारण अन्य कर्मचारियों पर दबाव पड़ रहा है। अभी वहां पांच लाख कर्मचारी कार्यरत हैं। अब राज्य के सामने समस्या होगी कि वह वेतन आयोग की सिफारिशें माने या फिर नए कर्मचारियों की नियुक्ति करे। जाहिर है कि वह ऐसे में बड़े पैमाने पर बहाली नहीं करना चाहेगी, बल्कि राज्य में बेरोजगारी भत्ता देते रहना चाहेगी।


ऐसा नहीं है कि यह हालत सिर्फ कर्नाटक की है। दिल्ली में सरकार मुफ्त बिजली-पानी दे रही है, लेकिन रोजगार नहीं। हजारों अस्थायी कर्मचारी वर्षों से आधी तनख्वाह में लटके पड़े हैं। अनुबंधित कर्मियों से काम चलाया जा रहा है। इस तरह से नए पद सृजित नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि सरकार पर वित्तीय बोझ बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा। कर्नाटक जैसे राज्यों के रवैये से तो यही लगता है कि सरकार की नौकरियां देने की कोई इच्छा नहीं है। अब रोजगार सिर्फ प्राइवेट सेक्टर ही दे रहा है और दे सकता है। इसके भरोसे रहना ही अब युवाओं की नियति है।

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