गौरतलब है कि हाल ही में जारी आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2022-23 में भारत से उत्पादों का निर्यात 447 अरब डॉलर और सेवा निर्यात 323 अरब डॉलर यानी कुल 770 अरब डॉलर रहा है। यद्यपि यह देश से निर्यात का सर्वोच्च स्तर है, लेकिन वर्ष 2022-23 में भारत का कुल व्यापार घाटा इससे पिछले वर्ष के 83 अरब डॉलर से बढ़कर 122 अरब डॉलर हो गया है। अब इस वर्ष व्यापार घाटे के और बढ़ने की आशंका है। भारत अपने कुल उत्पाद निर्यात का सबसे अधिक करीब 17.50 फीसदी निर्यात अमेरिका को करता है, जो मंदी की चपेट में आता दिख रहा है।
अमेरिका में महंगाई चरम पर है और इसे रोकने के लिए अमेरिकी फेडरल बैंक लगातार ब्याज दरों में इजाफा कर रहा है। यूरोप की आर्थिक दशा भी ठीक नहीं चल रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच यूरोप के अधिकतर देश गैस व खाद्य संकट से जूझ रहे हैं, जिससे वहां महंगाई बढ़ने के साथ औद्योगिक उत्पादन भी कम हो गया है। संभवत: यही कारण है कि वाणिज्य विभाग की तरफ से वित्त वर्ष 2023-24 के लिए कोई निर्यात लक्ष्य अब तक तय नहीं किया गया है। पिछले वित्त वर्ष में उत्पाद व सेवा निर्यात जिस ऊंचाई पर रहा, इस बार निर्यात को उस ऊंचाई तक पहुंचाना आसान नहीं दिख रहा है।
दूसरी ओर, बढ़ते हुए आयात को रोकना भी मुश्किल है। भारत का कुल आयात वित्त वर्ष 2022-23 में 892 अरब डॉलर रहा, जो वित्त वर्ष 2021-22 में 760 अरब डॉलर था। आयात में कमी लाना चुनौती है। यद्यपि चीन और भारत के बीच सीमा पर लगातार तनाव बढ़ा हुआ है, फिर भी विदेश व्यापार के क्षेत्र में भारत की चीन पर निर्भरता बनी हुई है।
निश्चित रूप से चालू वित्तीय वर्ष में विदेश व्यापार में घाटे को नियंत्रित करने के लिए आयात में कमी और निर्यात में वृद्धि करने के विभिन्न रणनीतिक कदम उठाने होंगे। चीन सहित विभिन्न देशों से घटिया और कम गुणवत्ता मानक वाले आयात को नियंत्रित करने की जरूरत है। सरकार ने उपभोक्ता की सुरक्षा व उनकी जिंदगी से जुड़े घटिया व कम गुणवत्ता के 2,000 से अधिक उत्पादों को चिह्नित किया है। अब उनके आयात नियंत्रण पर ध्यान देना होगा।
निर्यात बढ़ाने के लिए एक अप्रैल, 2023 से लागू नई विदेश व्यापार नीति, 2023 का कारगर क्रियान्वयन जरूरी है। इसके तहत इंसेंटिव की जगह टैक्स और विभिन्न शुल्क में राहत देते हुए निर्यात संबंधी काम को आसान बनाने की व्यवस्थाएं सुनिश्चित करके वर्ष 2030 तक देश से उत्पाद एवं सेवा निर्यात दो लाख करोड़ डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। नई विदेश व्यापार नीति के तहत सरकार ने निर्यात के दायरे को बढ़ाने के लिए जिला स्तर पर एक्सपोर्ट हब की स्थापना करने की घोषणा की है, जिससे निर्यात से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी दूर होगी।
निस्संदेह इस समय जब वैश्विक आर्थिक एवं व्यापार चुनौतियों के बीच कुल वैश्विक निर्यात में भारत का योगदान करीब 1.8 फीसदी और वैश्विक व्यापार में भारत का हिस्सा दो फीसदी से भी कम है, तब व्यापार घाटा कम करना सचमुच चुनौतीपूर्ण है। देश के विदेश व्यापार के सामने कई चुनौतियां खड़ी हैं। देश में माल परिवहन की लागत बहुत ऊंची 13-14 फीसदी है। विश्व बैंक के मुताबिक, भारत लॉजिस्टिक खर्च के मामले में दुनिया में बहुत पीछे है। शोध और नवाचार के मामले में भारत दुनिया में 40वें क्रम पर है। देश की श्रमशक्ति नई डिजिटल कौशल योग्यता से बहुत दूर है। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेटिव (पीएलआई) के संतोषप्रद परिणाम अभी मिलने शुरू नहीं हुए हैं। इन सब पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है, ताकि निर्यात बढ़े, आयात नियंत्रित हो और विदेश व्यापार घाटे में कमी आ सके।