वन में बहुत से लोग हैं, जो सपने देखते हैं। मगर, कुछ ही लोग ऐसे होते हैं, जो अपने सपने को पूरा करने के लिए कदम उठाते हैं। इनमें से भी विरले ही ऐसे होते हैं, जिनके सपने पूरे होते हैं। शायद इसी सोच के साथ पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर सपन ने उपन्यास लिखने के अपने सपने को सच कर दिखाया। हाल ही में आई उनकी पहली किताब 'फाइंडर्स कीपर्स' ने अंग्रेजी में लिखी जा रही रचनाओं की दुनिया में शानदार दस्तक दी है। किताब में हत्या की गुत्थी सुलझाने के बहाने सपन ने हमारे समाज में सदियों से अपना वजूद बरकरार रखने वाली परंपराओं, रीति-रिवाजों और धार्मिक प्रतीकों की एक नए नजरिये से व्याख्या की है।
वैसे तो किताब में रहस्य, रोमांच और रफ्तार सभी कुछ है, जो कहानी के आगे बढ़ने के साथ ही पाठक की उत्सुकुता को और बढ़ाता ही है। कहानी में कुछ हत्याएं होती हैं, जिसके बाद जांच एजेंसियों को लाशों पर कुछ धार्मिक प्रतीक, राख और आकृतियां मिलती हैं। जांच में जुटा एक खुफिया अधिकारी इतिहास और पुरातत्व के जानकार अपने एक साथी की मदद से अविश्वसनीय तरीके से इन हत्याओं की गुत्थी सुलझाता है। इसी क्रम में भारतीय धर्म, परंपराओं और प्रतीकों के बारे में सपन ने किताब के नायकों के हवाले से जिस तरह से व्याख्या की है, वह काबिले-तारीफ है। किताब से हर वह पाठक जुड़ाव महसूस कर सकता है, जिसने अपने बचपन में दादा-दादी, नाना-नानी और बड़े-बुजुर्गों से अक्सर मिथकीय चरित्रों और अपने इतिहास के बारे में किस्सागोई के रूप में सुना होगा और इस दरम्यान उसके भी जेहन में सवाल पैदा हुए होंगे।
मगर, समय की बेतरतीब गर्द के नीचे ये सवाल भी दफन हो गए। वक्त बीतने के साथ जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, शायद इन सवालों से हम दोबारा रूबरू नहीं हो पाते। यह किताब कुछ ऐसे सवालों से हमें फिर से रूबरू होने का मौका देती है। आजकल अमीष त्रिपाठी जैसे अंग्रेजी के चर्चित लेखकों के बीच भले ही भारतीय मिथकीय चरित्रों पर उपन्यास लिखने का चलन बढ़ा है, मगर सपन ने इनसे जुदा मिथकीय चरित्रों की व्याख्या करते हुए जिंदगी के ऐसे ही रहस्यों की दुनिया का वर्तमान के नजरिए से पड़ताल की है। जिंदगी में उनकी अहमियत बताई है। उनके यहां सदियों से चली आ रही परंपराओं का कहीं भी सीधे तौर पर नकार नहीं है, बल्कि तर्कों की कसौटी पर कसते हुए उनकी बुनियाद और मजबूत की गई है। सपन की किताब में जिंदगी नन्हे से बच्चे की तरह सवाल करती है और जवाब नहीं मिलने पर खुद ब खुद जवाब ढूंढने में लग जाती है।
बहुत सी बातें, जो अनायास ही हमारी जिंदगी से जुड़ी होती हैं, उनको परत दर परत विस्तार से खोलती है यह किताब। यहां जिंदगी राज भी है और राज से उठने वाला पर्दा भी। यहां जिंदगी में गुजरने वाली हर छोटी-बड़ी घटनाएं एक सवाल, एक बेचैनी पैदा करती हैं। कहीं उलझने हैं, तो कहीं इसके खुलने वाले सूत्र। इन सबके बीच कहीं गुजरी हुई यादें हैं, तो कहीं पतझड़ में अपनी शाखों से बिछड़ने की टीस। जेहन में गहराई तक पैबस्त संस्कारों के बीज भी हैं, जो सब कुछ जानते और मानते हुए समय के साथ पनप रहे हैं। सपन के यहां बिखरी हुई कड़ियों को कहीं जोड़ने की कोशिश है, तो कहीं यूं ही कंधे उचकाकर चल देने की अलमस्ती भी। कुल मिलाकर अपनी पहली ही कोशिश में सपन ने किताब के कथानक के साथ न्याय किया है।
फाइंडर्स कीपर्स
लेखक- सपन
प्रकाशक-फ्रॉग बुक्स, मुंबई
मूल्य-400 रुपये