महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के लिए सबसे अच्छी बात यह है कि उन्हें चयन की ऐसी आजादी मिली है, जैसी पिछले पच्चीस वर्षों में नहीं मिली थी। पांच प्रमुख पार्टियों के उम्मीदवारों के साथ ही कई निर्दलीय और ढेर-से बागी। राज्य पर आरीपारी राज करने वाले दो प्रमुख गठबंधन—कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शिवसेना-भाजपा टूटकर एक-दूसरे के सामने खम ठोककर क्यों खड़े हो गए, यह मतदाता की समझ से परे है।
कहा नहीं जा सकता कि कांग्रेस से 288 में से आधी सीटों की मांग पर गठजोड़ तोड़कर राकांपा ने ज्यादा जोखिम उठाया या फिर 151 सीटों की दावेदारी पर अड़कर शिवसेना ने अधिक खतरा मोल लिया। लेकिन इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब नहीं है कि कांग्रेस-राकांपा के पंद्रह वर्षों के भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के आरोपों में घिरे शासन के खिलाफ राज्य भर में खदबदाते जनज्वार के बावजूद शिवसेना-भाजपा गठबंधन ने थाली में परोसी दिख रही सत्ता का रसास्वादन करने के बजाय आपस में सिर-फुटौवल का फैसला क्यों किया?
कुछ स्पष्टीकरण जरूर हैं। मसलन, नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व में केंद्र में भाजपा के बहुमत वाली सरकार बनने के बाद पार्टी महाराष्ट्र में शिवसेना के 'छोटे भाई' की भूमिका निभाने को तैयार नहीं थी। भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना की 18 सीटों के मुकाबले न केवल 23 सीटें जीतीं, बल्कि पश्चिम महाराष्ट्र और मराठवाड़ा जैसे कांग्रेस-राकांपा के गढ़ों में दोनों पार्टियों का लगभग सफाया कर दिया।
मोदी की अगुआई में भाजपा ने राज्य के हर क्षेत्र में अपनी दुंदुभि बजाई। शिवसेना अपने संस्थापक बाल ठाकरे के जीवित रहते और 'मराठी माणूस' की अस्मिता के लिए संघर्ष के बावजूद ऐसी सफलता कभी हासिल नहीं कर पाई। बाल ठाकरे के लिए भाजपा के पुराने नेताओं में जो सम्मान था और जिसकी वजह से भाजपा विदर्भ और उत्तर महाराष्ट्र जैसे इलाकों में शिवसेना से ज्यादा ताकत हासिल कर लेने के बावजूद छोटे भाई की भूमिका कुबूल करती रही, वह परिदृश्य मोदी के प्रधानमंत्री और उनके विश्वस्त अमित शाह के भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद बदल गया।
शिवसेना का आभामंडल, राज ठाकरे के अलग होने के बाद ही मद्धिम पड़ गया था, बाल ठाकरे के गुजर जाने के बाद तो वह गायब ही हो गया। इसके अलावा बाल ठाकरे के बेटे उद्धव में न तो पिता जैसी अपील है और न ही उन जैसी उग्रता। ऐसे में शिवसेना को शाह और महाराष्ट्र में भाजपा की कमान संभालने वाले युवा नेताओं से बराबरी के लेन-देन की व्यावहारिकता दिखाने की जरूरत थी। लेकिन शिवसेना जैसे किसी भी हठी क्षेत्रीय दल के लिए राज्य पर अपनी दावेदारी का हक छोड़ने का मतलब अपने खात्मे की शुरुआत होती। इसलिए भाजपा के 'विश्वासघात' का रोना रो रही शिवसेना की लड़ाई अब दरअसल राज्य में अपनी अहमियत बनाए रखने की है।
कांग्रेस से अलग हुई राकांपा की लड़ाई भी कमोबेश यही है, जिसे वह खास तौर पर पश्चिम महाराष्ट्र के अपने गढ़ में मराठों के वोटबैंक और चीनी मिलों, सहकारी संस्थाओं तथा शिक्षण संस्थाओं के बूते लड़ना चाहती है। फिर राकांपा के मुखिया शरद पवार की ख्याति ऐसे राजनेता की है, जो डूबते जहाज में सफर नहीं करते। राज्य में सत्ता-विरोधी आंधी झेल रही कांग्रेस से अलग होने में ही राकांपा का कल्याण था। लोकसभा चुनाव में उसने कांग्रेस से दोगुनी-चार सीटें भी हासिल की थी। राकांपा, विशेष रूप से पवार के भतीजे और उप-मुख्यमंत्री रहे अजित पवार को गुस्सा इस बात का भी था कि मुख्ममंत्री पद पर दिल्ली से पृथ्वीराज चव्हाण को भेजे जाने के बाद पार्टी को मिले हुए मलाईदार मंत्रालयों में सूखा पड़ गया था। लेकिन अपने कई प्रभावी नेताओं के भाजपा का दामन थाम लेने और मराठवाड़ा-पश्चिम महाराष्ट्र में कड़ी चुनौती मिलने से पार्टी के लिए लड़ाई अस्तित्व की है।
गठबंधन के बावजूद किसी भी चुनाव में शिवसेना के संगठन तंत्र का सहयोग न मिलने से आजिज भाजपा ने लोकसभा चुनाव में अपनी सफलता और मोदी के करिश्मे के बल पर अलग-अलग जातियों तथा वर्गों के छोटे दलों को जोड़े रखकर जो दांव खेला है, वह जोखिम भरा तो है, लेकिन इसमें उसके सबसे बड़े दल के बतौर उभरने की संभावनाएं भी हैं।
इसी कारण कांग्रेस-राकांपा के कई प्रभावशाली नेता रातोंरात भाजपा उम्मीदवारों के रूप में अवतरित हो गए। ये ऐसे नेता हैं, जिनकी चुनावी ताकत अपने वंश, चीनी मिलों या सहकारी संस्थाओं से आती है। मोदी की तूफानी सभाओं से पार्टी की भुजाएं फड़क रही हैं, उस पश्चिम महाराष्ट्र में भी, जहां उसका कोई ठौर न था। मोदी की कोई भी सभा लाख-डेढ़ लाख से कम की नहीं हुई और महानगर-शहरों की बनिस्बत ग्रामीण क्षेत्रों में मोदी को लेकर उत्साह ज्यादा है। वोट भी वहीं ज्यादा पड़ते हैं।
मोदी को मिल रहे समर्थन के मद्देनजर माना जा रहा है कि यदि उनका प्रचार पहले शुरू हो गया होता, तो पार्टी का 145 सीटों की सीमा पार करना तय था। एक चुनाव अनुमान तो भाजपा और उसके साथी चार दलों के गठबंधन को 152 सीटें मिलने का भी है। लेकिन मुंबई, पुणे तथा मराठवाड़ा में शिवसेना की चुनौती के मद्देनजर पार्टी को अपने परिवारी संगठनों से मदद की गुहार लगानी पड़ी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता लोकसभा चुनाव की तरह इस बार भी ज्यादा से ज्यादा मतदान कराने के लिए मैदान में होंगे।
लेकिन ऐसा न हुआ तो? क्या भाजपा शिवसेना को गठजोड़ के लिए आवाज देगी या निर्दलीयों या राकांपा का साथ लेगी? संभावना यह भी है कि बहुमत से दूरी बहुत कम रह जाए, तो भाजपा-शिवसेना के रिश्तों की डोर टूट ही जाए?