फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

फागुन के दिन चार रे: होली पुरातन पर्व है... आरंभिक नाम ‘होलाका’ था; रामस्नेही संप्रदाय में होली पर फूलडोल

शास्त्री कोसलेंद्रदास, दर्शन विभागाध्यक्ष, राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय Published by: ज्योति भास्कर Updated Fri, 14 Mar 2025 04:40 AM IST

सार

होली केवल सगुण भक्ति परंपरा का ही चैतन्य पर्व नहीं है, बल्कि निर्गुणियों पर भी इसका गहरा प्रभाव है। निर्गुणी संप्रदायों की होली नाच-गान और धूम-धड़ाके से दूर होती है।
विज्ञापन
विज्ञापन
भारतीय संस्कृति में होली के कई रंग (प्रतीकात्मक एआई तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला / आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस


भारत रत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे के धर्मशास्त्र का इतिहास के अनुसार होली पुरातन पर्व है। जैमिनी सूत्र में इसका आरंभिक नाम ‘होलाका’ था। शबर स्वामी का कथन है कि होलाका उत्सव सभी लोगों द्वारा मनाया जाता था। ‘होलाका’ का उल्लेख वात्स्यायन के कामसूत्र में भी है, जिसमें फाल्गुन पूर्णिमा को एक-दूसरे पर रंग मिश्रित जल फेंका जाता है। यह पानी की पिचकारियों से रंग खेलने का उत्सव है। कामसूत्र में होली से संबंधित ‘सुवसंतक’ और ‘अभ्यूष-खादिका’ उत्सवों का भी उल्लेख है। होली का संबंध नए अनाज से है। यजुर्वेद में नए धान्य को ‘वाज’ कहा गया है। होली के दिन ‘वाज’ की आहुति अग्नि में दी जाती है, जिसे ‘नवधान्य-इष्टि’ कहा जाता है। आग में थोड़ा पकने के बाद यह ‘वाज’ से ‘अभ्यूष’ हो जाता है। इस प्रकार, होली नए धान्य को आग में भूनकर खाने का उत्सव है, जिसे ‘अभ्यूष-खादिका’ कहा जाता है। हेमाद्रि ने होलिका-पूर्णिमा को ‘हुताशनी’ कहा है। लिंगपुराण में फाल्गुन पूर्णिमा ‘फाल्गुनिका’ है, जो बाल क्रीड़ाओं से पूर्ण और लोगों को ऐश्वर्य देने वाली है। वराहपुराण में होली को ‘पटवास-विलासिनी’ कहा गया है, जिसका अर्थ है चूर्ण (रंगों) से युक्त क्रीड़ाओं वाली। भविष्योत्तरपुराण में धर्मराज युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण के संवाद से जुड़ी होली की एक कथा भी है।


होली का एक पुराना वर्णन सातवीं सदी के संस्कृत नाटककार और कन्नौज के महाराज हर्षवर्धन ने अपने नाटक रत्नावली में किया है। वहां की होली ‘वसंतोत्सव’ के रूप में चित्रित है। प्राकृत साहित्य की गाहा सतसई में भी होली को ‘फाल्गुनोत्सव’ के रूप में वर्णित किया गया है, जिसमें नदी किनारे युवक-युवतियां एक-दूसरे पर रंग फेंककर आनंद मनाते हैं। होली केवल सगुण भक्ति परंपरा का ही चैतन्य पर्व नहीं है, बल्कि निर्गुणियों पर भी इसका गहरा प्रभाव है। निर्गुणी संप्रदायों की होली नाच-गान और धूम-धड़ाके से दूर होती है। नाम जप को महत्व देने वाले निर्गुणी संप्रदाय होली को प्रह्लाद उपाख्यान से जोड़ते हैं। वे मानते हैं कि प्रह्लाद ने भगवान के नाम जप पर विश्वास कर अनूठी निष्ठा प्रकट की। कबीर, दादू, गुरु जंभेश्वर, संत रामचरणदास और ब्रह्मानंद जैसे निर्गुणियों के साथ ही भक्तिमती मीरा ने होली की लाली को अपने भीतर उतारा।


ब्रह्मानंद के कन्हाई तो ऐसी अजीब होली मचा देते हैं, जिसमें एक अद्भुत चमत्कार है। एक समय श्रीकृष्ण प्रभु को होली खेलने का मन हुआ, लेकिन वह अकेले होली नहीं खेलते। उन्होंने एक से अनेक की ‘बहुताई’ प्रकट की। पांच महाभूतों से बनी एक पिचकारी बनाई, जिसमें रंग भरकर चौदह भुवनों की सृष्टि कर डाली। फिर पांच ज्ञानेंद्रियों के विषय-रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श की गुलाल बनाकर उसे ब्रह्मांड में उड़ाया। जिन-जिन पर यह गुलाल पड़ी, उनकी सुध-बुध खो गई। विश्नोई संप्रदाय होली की रात शोक मनाता है। गुरु जांभोजी ने कहा था, प्रह्लाद से वाचा कीन्हीं, आयो बारां काजै, अर्थात प्रह्लाद को दिए गए वचनानुसार वह लोगों के कल्याण के लिए धरती पर प्रकट हुए हैं। भक्त प्रह्लाद विश्नोइयों के आदिगुरु हैं। विश्नोई संप्रदाय में होलिका दहन नहीं किया जाता। उनकी मान्यता है कि होलिका भक्तशिरोमणि प्रह्लाद को मारने की कोशिश कर रही थी, इस कारण भक्तों में शोक का वातावरण है।


रामस्नेही संप्रदाय में होली पर फूलडोल होता है। इसमें संत दादू के शिष्य जनगोपाल द्वारा लिखित प्रह्लाद चरित का रात्रि में पाठ किया जाता है। फूलडोल से तात्पर्य है, देवन आए पुष्प बरसाए, ताते फूलडोल कहलाए, यानी भक्त प्रह्लाद के अग्नि में न जलने पर देवताओं ने उनके भक्ति चमत्कार से अभिभूत होकर उन पर पुष्प बरसाए, यही फूलडोल है। मेवाड़ की पुण्यधरा में मीरा अपने गोविंद के विरह में तड़प रही हैं। उनकी होली प्रेम के रंगों में भीगी हुई है। होली पर केवल कृष्ण रंग उड़ रहा है। मीरा होली को असाधारण रूप में व्यक्त कर रही हैं - फागुन के दिन चार रे, होली खेल मना रे। श्याम रंग में रंगी मीरा की चुनरिया को उनके श्याम पिया खुद रंगने आते हैं। भक्ति का रंग इतना अद्वितीय है कि बिना आंखों वाले संत सूरदास भी इसे अपने ज्ञानचक्षुओं से पहचानते हैं- सूरदास की काली कमरिया चढ़त न दूजो रंग!
विज्ञापन
विज्ञापन
Next