फगुआ तो सहज उल्लास की ठेठ अभिव्यक्ति है। आधुनिकता का दंभ लादे चलने वाले से कौन बहस करे कि वसंत पर्व आधुनिकता का मुद्दई नहीं है, हमसफर है, मित्र है। होली सामने है। होली-नर्तन में भाग लेने का नेवता आया है। उल्लसित फगुआ का ठाठ देखकर मैं बराबर सोचता हूं, राजपुरुषों, सामंतों, श्रीमंतों के कब्जे में रहा होगा किसी दिन वसंत-पर्व, मगर प्रकृतितः है यह मैदानी पर्व।
अपने अर्थ-बल से विलास-नद की रचना कर उसमें डुबकी लगाने वाले फगुआ का मौलिक आस्वाद नहीं पा सकते। वे तो अहंकार की रचना करते हैं और समझते हैं कि पर्व मना रहे हैं। पर्व पर्व नहीं होता, यदि उसके स्पर्श से मन की गांठ नहीं खुलती, मैल नहीं धुलती। मन के स्तर पर मैल जमी हो और पर्व का आयोजन करने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा हो, तो पर्व ऐसे आयोजन से मुंह फेर लेता है। लाख निहोरा करें, कृत्रिमता से पर्व का समझौता नहीं होता।
कहते हैं, होली ब्रज में उल्लसित होती है। ब्रज के हवा-पानी में ही वह रस है, जो घूंघट का पट विदीर्ण कर देता है। फागुनी हवा का परस लोक को उत्तेजना देता है और सभ्यता का ओढ़ना लोग उतार फेंकते हैं। मेरे ग्रामांचल का फगुआ-राग सुनकर शहर के नफीस मिजाजवाले बाबू लोग कान मूंद लें। सचमुच मनुष्य के वास्तविक रूप की अकुंठ अभिव्यक्ति सबके लिए सह्य नहीं होती। मुझे फगुआ-आवेग खींचता है। आप चाहें तो मुझे निहायत पुराणपंथी मान लें, बज्र देहाती। मुझे बुरा नहीं लगेगा।
अपना देहाती रंग-रूप ही भला है, जो लोक-कंठ में गूंजता है, फाग-राग में छलकता है, चैता की मादकता बिखेरता है, धरती के नेह-छोह की कीमत उजागर करता है, आदमी को सामाजिक राग-रंग में बोरता है। फगुआ उन्मुक्त मन का सहज उल्लास है। मेरे गांव चलिए, एक जोगीरा सुनकर आप चित हो जाएंगे। कबीर हो या फगुआ, एक उत्तान राग सुनिए, तबीयत लहालोट न हो जाए तो कहिए।
मगर पूरे गांव के उल्लास को व्यंजित करनेवाला, एक समूह-कंठ से गूंजनेवाला फाग-राग अब सुनाई नहीं पड़ता। ग्रामीण सहज आत्मीयता बिला गई है। मेरे अंचल में लोक-कंठ से फागुन में एक आवाज गूंजती थी, 'भरि फागुन बुढ़वा देवर लागे।' अब जवान देवर भी खूसट की तरह मुंह लटकाए रहता है। मेरा देहाती मन फगुआ को तलाश रहा है। फगुआ मर जाएगा, तो हम जीकर क्या करेंगे! संक्राति को संस्कृति में फगुआ ही बदल सकता है।