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सूत्रधार : किसी से घृणा किसी से प्रेम

बलबीर पुंज
Updated Sun, 09 Jan 2022 06:39 AM IST

सार

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू और समकालीन विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी, अलग-अलग विचारधाराओं के ध्वजवाहक थे। दोनों में गहरा मतभेद था, परंतु मनभेद नहीं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : सोशल मीडिया


तब इसके मुख्य सूत्रधार कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी के साथ दिग्विजय सिंह, पी.चिदंबरम, सुशील कुमार शिंदे आदि थे। आखिर आरएसएस और भाजपा से अकूत द्वेष का कारण क्या है? भारत की सनातन संस्कृति की रक्षा, एकता, संप्रभुता, समावेशी विचारों, बहुलतावाद और राष्ट्रवाद के कारण संघ और भाजपा- स्वतंत्र भारत में एक विशेष समूह द्वारा दशकों से 'घृणा' के साथ राजनीतिक-वैचारिक-सामाजिक 'अस्पृश्यता' का दंश झेल रहे हैं। 


कुछ दिन पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत की समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के साथ एक वैवाहिक कार्यक्रम में बैठने, तो ट्रेन में वाईएसआर-कांग्रेस के राज्यसभा सांसद वी.विजयसाई रेड्डी के साथ तस्वीर वायरल हुई। अक्सर, विरोधी नेताओं की एकाएक भेंट पर कई तरह के राजनीतिक अनुमान लगाए जाते हैं, जोकि स्वाभाविक भी है। किंतु इन तस्वीरों पर अधिकांश विरोधियों ने जिस प्रकार प्रतिक्रिया दी, उससे ऐसा लगा कि जैसे संघ के शीर्ष पदाधिकारी से मिलना अक्षम्य 'अपराध' के समरूप है।


पिछले 75 वर्षों से भारतीय नैरेटिव विदेशी मार्क्स-मैकॉले चिंतन से जकड़ा हुआ है। इनके मानसपुत्रों को भ्रम है कि विचारों पर केवल उनका विशेषाधिकार है और उनके मुख से निकली प्रत्येक बात अंतिम सत्य है, जबकि संघ और भाजपा के विचार- विमर्श योग्य भी नहीं। यह स्थिति तब है, जब भारतीय सनातन संस्कृति में मतभिन्नता अनादिकाल से स्वीकार्य है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू और समकालीन विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी, अलग-अलग विचारधाराओं के ध्वजवाहक थे। 


दोनों में गहरा मतभेद था, परंतु मनभेद नहीं। यह पं. नेहरू द्वारा अटल के प्रधानमंत्री बनने की 'भविष्यवाणी' और वाजपेयी द्वारा पं. नेहरू के निधन पर दी गई भावुक श्रद्धांजलि से स्पष्ट है। इसके अतिरिक्त, 1962 के भारत-चीन युद्ध में संघ की नि:स्वार्थ राष्ट्रसेवा देखने और पूर्वाग्रह के बादल छंटने के बाद 1963 के गणतंत्र दिवस में परेड के लिए पं. नेहरू द्वारा आरएसएस को आमंत्रित करना, 1965 में पाकिस्तान से युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के निमंत्रण पर संघ के तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर का सामरिक बैठक में पहुंचना, 1973 में गोलवलकर के निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा शोक प्रकट करते हुए उन्हें राष्ट्र-जीवन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला विद्वान और प्रभावशाली व्यक्ति बताना- स्वस्थ लोकतंत्र और बहुलतावाद के प्रतीक थे।


यह परिदृश्य तब बदलना प्रारंभ हुआ, जब 1969 में कांग्रेस के टूटने के बाद इंदिरा गांधी ने अपनी सरकार बचाने के लिए वामपंथियों का सहारा ले लिया और उनका सनातन भारत विरोधी दर्शन, राष्ट्रीय मुख्यधारा का अंग बन गया। तब कांग्रेस ने वामपंथी चिंतन को 'आउटसोर्स्ड' कर लिया और कालांतर में पार्टी उससे ऐसी जकड़ी कि जिन इंदिरा गांधी ने वीर विनायक दामोदर सावरकर के सम्मान में स्वयं डाक-टिकट जारी करते हुए स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान की प्रशंसा की थी, उन्हीं इंदिरा की पार्टी और समकक्ष नेताओं ने संघ और सावरकर के खिलाफ विषवमन शुरू कर दिया।


यह वामपंथीकरण का प्रभाव है कि कांग्रेस ने अंडमान की अंडाकार जेल से वीर सावरकर के विचारों को हटा दिया, सर्वोच्च न्यायालय में शपथपत्र देकर श्रीराम को काल्पनिक बता दिया, मनगढ़ंत 'हिंदू/भगवा आतंकवाद' सिद्धांत को जन्म दिया, हिंदू-विरोधी सांप्रदायिक विधेयक ले आई, जेएनयू में 'भारत तेरे टुकड़े होंगे...' नारे लगाने वाले आरोपियों का समर्थन किया, अलगाववादियों-आतंकियों से हमदर्दी रखी, भारतीय सेना के शौर्य (सर्जिकल स्ट्राइक सहित) पर प्रश्नचिह्न लगाया।
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चुनाव में पराजय के लिए ईवीएम-चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाया, कोविड-रोधी स्वदेशी टीकों पर संदेह जताया, तो अब हिंदुत्व का तिरस्कार करके समस्त हिंदू समाज को फिर से कलंकित कर रही है। मतभिन्नता, लोकतंत्र और बहुलतावाद को स्वस्थ रखती है। परंतु विचारों में भिन्नता शत्रुभाव में नहीं बदलनी चाहिए। यदि सभ्य-समाज में सामाजिक अस्पृश्यता अस्वीकार्य है, तो लोकतंत्र में राजनीतिक अस्पृश्यता को कैसे स्वीकार किया जा सकता है?

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