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Time: सौ साल बाद भी समय को लेकर उठे सवाल का आज भी नहीं मिला जवाब, क्या वक्त एक धोखा है?

मैतयास मॉर्वेक, गिल्फोर्ड पोस्ट डॉक्टरल फेलो, सेंट एंड्रयूज यूनिवर्सिटी Published by: निर्मल कांत Updated Sun, 05 May 2024 06:58 AM IST

सार

हम हर चीज पर संदेह कर सकते हैं, लेकिन अपने जन्म, जीवन और मृत्यु पर संदेह नहीं कर सकते। इस यात्रा में उम्र के कई पड़ाव भी हम पार करते हैं, जिन्हें समय की समझ के बगैर नहीं समझा जा सकता। लेकिन भौतिक विज्ञानियों में यह संदेह है कि जिस तरह हम समय का अनुभव करते हैं, वह मौजूद है भी या नहीं?
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समय (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : एएनआई (फाइल)


हम हर चीज पर संदेह कर सकते हैं, लेकिन अपने जन्म, जीवन और मृत्यु पर संदेह नहीं कर सकते। इस यात्रा में उम्र के कई पड़ाव भी हम पार करते हैं, जिन्हें समय की समझ के बगैर नहीं समझा जा सकता। लेकिन भौतिक विज्ञानियों में यह संदेह है कि जिस तरह हम समय का अनुभव करते हैं, वह मौजूद है भी या नहीं? अल्बर्ट आइंस्टीन का सापेक्षता का सिद्धांत कहता है कि समय निरपेक्ष न होकर सापेक्ष है। इसे एक उदाहरण से समझें। दिल्ली से लखनऊ के बीच की करीब साढ़े पांच सौ किलोमीटर की दूरी अगर सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तय करें, तो हमें लखनऊ पहुंचने में साढ़े पांच घंटे लगते हैं। लेकिन अगर यही दूरी इससे ज्यादा तेज गति से तय की जाए, तो यात्रा में लगने वाला समय कम हो जाता है। जाहिर है कि आप कितनी तेजी से यात्रा कर रहे हैं, इसके आधार पर यह तेज या धीमा हो सकता है। इस आधार पर ही आधुनिक भौतिकी कहती है कि समय एक भ्रम भी हो सकता है।

 

वर्तमान क्षण जैसा कुछ नहीं

वैज्ञानिक लंबे समय से मानते आ रहे हैं कि समय पूर्ण और सार्वभौमिक है, जो हर किसी के लिए एक समान, हर जगह और स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में है। आइंस्टीन के सिद्धांतों के अनुसार, ब्रह्मांड एक स्थिर, चार आयामी ब्लॉक है, जिसमें सभी देश व काल एक साथ अस्तित्व में हैं और जिसमें किसी खास वर्तमान क्षण जैसी कोई चीज नहीं है। किसी के लिए जो अतीत है, वही दूसरे के लिए भविष्य हो सकता है। इसका अर्थ यह भी है कि समय अतीत से भविष्य की ओर यात्रा नहीं करता, जैसा अमूमन समझा जाता है। भौतिक विज्ञान के विभिन्न हिस्सों में जैसे क्वांटम यांत्रिकी में समय के विचार को लेकर एक टकराव दिखता है। तो क्या वाकई समय एक भ्रम है, यह पता लगाने का एक ही तरीका है कि तर्क का उपयोग कर यह साबित किया जाए कि समय अवास्तविक है।


मैक्टेगार्ट का तर्क

1908 में, एक अंग्रेज दार्शनिक जे.एम. ई. मैक्टेगार्ट ने तर्क दिया कि हम केवल तार्किक सोच का उपयोग करके समय के भ्रम को समझ सकते हैं। मान लीजिए, किसी ने आपको ताश के पत्तों का एक बॉक्स दिया है, जिनमें से प्रत्येक कार्ड एक घटना का प्रतिनिधित्व करता है। एक पत्ता वर्ष 2024 का, दूसरा महारानी विक्टोरिया की मृत्यु का, और तीसरा 2026 में सूर्य ग्रहण को दर्शाता हो। ताश के इन पत्तों को मिला दिया गया है। आपको इन पत्तों को इस तरह से व्यवस्थित करने के लिए कहा गया है, जो समय का प्रतिनिधित्व करे। आप यह कैसे करेंगे?


पहला विकल्प बी-शृंखला

मैक्टेगार्ट इसका पहला तरीका बताते हैं, बी-शृंखला। इसमें आप पहला पत्ता चुनते हैं और उसे जमीन पर रख देते हैं। अब आप दूसरा पत्ता चुनते हैं और उसकी तुलना पहले से जमीन पर रखे पत्ते से करते हैं। अगर दूसरा पत्ता उससे पहले की घटना है, तो इसे जमीन पर रखे पत्ते के बाईं ओर रख देते हैं और अगर बाद की घटना है, तो दाईं ओर रख देते हैं। आप देखेंगे कि रानी विक्टोरिया की मृत्यु वाला पत्ता 2026 के सूर्य ग्रहण वाले पत्ते के बाईं ओर रखा जाएगा। 2024 वाला पत्ता 2026 के सूर्य ग्रहण वाले पत्ते के बाईं ओर, लेकिन रानी विक्टोरिया की मृत्यु वाले पत्ते के दाईं ओर रखा जाएगा। आप यह प्रक्रिया तब तक दोहराते रहें, जब तक कि आप एक क्रम में पत्ते न पा लें। लेकिन जब आप एक क्रम में पत्ते पा लेते हैं, तब आपको किसी कमी का एहसास होता है। अब पत्तों की पंक्ति स्थिर है, अब उनमें किसी बदलाव की जरूरत नहीं। अब आप कैसे कह सकेंगे कि समय बदलाव को दिखाता है? आखिर भौतिक विज्ञान भी तो यही कहता है कि समय बदलाव को मापने का जरिया है। कोई भी उपकरण जो समय को मापता है, वह बदलाव पर ही निर्भर होता है। जैसे घड़ी अपनी सुइयों की गति पर। याद कीजिए, आपका मूल काम पत्तों को इस क्रम में व्यवस्थित करना था, जो समय का सही ढंग से प्रतिनिधित्व करता हो। लेकिन अंत में आप वहां पहुंच गए, जो नहीं बदलता। अब इस आधार पर यह कहना कि समय नहीं बदलता, तो अजीब होगा। जाहिर है कि बी-शृंखला समय को कैप्चर नहीं करती।


ए-शृंखला की सीमाएं

एक और भी विकल्प है। आप फिर से शुरू कर सकते हैं। इसे मैक्टेगार्ट ‘ए-शृंखला’ कहते हैं, जिसका उपयोग करके आप फिर से ताश के पत्तों को व्यवस्थित कर सकते हैं और समय को भी समझ सकते हैं। आप पत्तों के तीन ढेर बनाएं। बाईं ओर की ढेरी अतीत में घटी घटनाओं को दर्शाती है, जैसे रानी विक्टोरिया की मृत्यु। बीच में वे घटनाएं, जो वर्तमान में घटित हो रही हैं, जैसे वर्ष 2024 और दाईं ओर, वे जो भविष्य में घटित होंगी, जैसे-2026 का सूर्य ग्रहण। बी-शृंखला के विपरीत, यह व्यवस्था स्थिर नहीं है। जैसे-जैसे समय बीतता है, आपको पत्तों को दाएं (भविष्य) से मध्य (वर्तमान) और फिर बाएं (अतीत) ढेर में लाना होगा। क्या इसका मतलब यह कि ए-शृंखला समय का वर्णन करती है? मैक्टेगार्ट के अनुसार, ए-शृंखला गोलाकार है। आपके हाथ द्वारा पत्तों को बाएं ढेर से मध्य और फिर दाएं ढेर में ले जाना एक ऐसी प्रक्रिया है, जो समय में पहले ही हो चुकी है और आप उसका अनुकरण भर कर रहे हैं। इस व्यवस्था को चलाने के लिए आपको केवल समय पर रहना होगा। लेकिन समय को पकड़ने के लिए आपको समय से पहले होना होगा।


मैक्टेगार्ट का निष्कर्ष

जाहिर है कि बी-शृंखला समय को विश्लेषित नहीं कर सकती, क्योंकि उसमें बदलाव नहीं है। ए-शृंखला भी नहीं कर सकती, क्योंकि यह बदलाव तो करती है, लेकिन यह वृत्ताकार है, जिसमें पहले चीजें समय में घटती हैं, और आप सिर्फ अनुकरण करते हैं। इस आधार पर मैक्टेगार्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि समय वास्तविक नहीं है, यह एक भ्रम है।
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सौ साल बाद

सौ साल से भी ज्यादा वक्त बीतने के बाद भी समय को लेकर उठा सवाल आज भी अनुत्तरित है। ए और बी शृंखलाओं की सीमाओं के बाद एक सी-शृंखला की बात की जाने लगी, जिसके सिद्धांतकार कहते हैं, पत्तों की अतीत या भविष्य जैसी कोई दिशा नहीं होती। वर्ष 2024, रानी विक्टोरिया की मृत्यु और 2026 के सूर्य ग्रहण के बीच आता है। लेकिन सी-सिद्धांत के अनुसार ऐसा कोई क्रम नहीं है, यह केवल एक मानसिक आदत है। यह दीवार पर चित्र उकेरने जैसा है। आप कितने ही चित्र उकेर लें, दीवार की अपनी कोई दिशा नहीं होती। ए, बी या सी कौन-सी शृंखला सही है, या कोई भी सही नहीं है, यह तो समय ही बताएगा। महत्वपूर्ण यह है कि मैक्टेगार्ट ने बगैर किसी वैज्ञानिक निष्कर्ष का सहारा लिए समय की समस्या के समाधान के तर्क को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।

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