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जलवायु परिवर्तन: गोमुख ग्लेशियर में बदलाव खतरे की घंटी, त्यागना होगा पर्यावरण और विकास के बीच की दुश्मनी

सुरेश भाई
Updated Fri, 29 Nov 2024 07:27 AM IST

सार

गंगा और यमुना के उद्गम स्थल से बर्फ कम होने लगी है, जिसके कारण बरसात को छोड़कर शेष मौसमों में इन नदियों की जलराशि घट रही है।
 
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला


लंबे समय से पर्याप्त बर्फ न पड़ने के कारण गोमुख ग्लेशियर के पिघलने की दर बढ़ गई है। रोजाना पिघलने की दर लगभग पांच सेंटीमीटर है, जिसके कारण ग्लेशियर की निचली सतह खोखली होने लगती है और ग्लेशियर टूटकर बड़े-बड़े बोल्डर के रूप में गंगोत्री तक बहकर आते हैं। यह स्थिति 2023-24 में अधिक दिखाई दी है। इससे पहले भी वर्ष 2017 में मेरु पर्वत के पास नीला ताल, जो बर्फीली झील के रूप में है, के टूटने से भी ग्लेशियर प्रभावित हुआ है, जिसका मलबा गोमुख में लगभग दो किमी क्षेत्र में फैल गया था। एक छोटी झील भी बनी। इसके बाद अनियंत्रित बारिश के कारण बड़ी मात्रा में ग्लेशियर के साथ मलबे के ढेर भागीरथी घाटी में दिखाई देते हैं। लेकिन आज के बदले हुए मौसम की तरह पहले ग्लेशियरों के आसपास तेज बारिश नहीं होती थी। मौसम तुरंत बदलने के बाद सीधे बर्फ गिरनी शुरू हो जाती थी। अब ग्लेशियरों के ऊपर तेज बारिश हो रही है, जिसके बाद हर बरसात में गंगोत्री मंदिर के आसपास बाढ़ से भयानक स्थिति पैदा होती है, जिसका प्रभाव मैदानी क्षेत्रों तक पड़ रहा है।


बाडिया भूगर्भ विज्ञान संस्थान की 2022 की रिपोर्ट बताती है कि गोमुख ग्लेशियर पिछले 87 वर्षों में 1700 मीटर पीछे चला गया है। भारतीय हिमालय क्षेत्र में कुल 9,500 बड़े और हजारों छोटे-छोटे ग्लेशियर की स्थिति भी यही है। मिलम, पिंडारी, सतोपंथ ग्लेशियर भी हर साल 15-20 मीटर पीछे हट रहे हैं, जिसका प्रभाव 44 फीसदी आबादी पर पड़ रहा है। इसको समझने के लिए अध्ययन की जरूरत यह है कि अंधाधुंध मानवीय आवाजाही के कारण यहां की जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? इस संबंध में जो वैज्ञानिक शोध सामने आए हैं, उन्हें प्रकाश में लाने की आवश्यकता है। गंगा के पवित्र जल का महत्व विदेशों में भी है। 1972 में मॉरीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम गंगोत्री से जल लेकर गए थे, जिसे उन्होंने मॉरीशस में ‘ग्रों बास्सें’ नामक ज्वालामुखी झील में मिलाया था। और गंगा तालाब के नाम से वहां का तीर्थ स्थल बनाया।


चिंताजनक है कि गंगा की जलराशि तेजी से घट रही है। यही स्थिति यमुना की भी है, जो बंदर पूंछ पर्वत की ढलानों पर यमुनोत्री ग्लेशियर (6,320 मीटर) से आ रही है। यह ग्लेशियर 12 किमी लंबा है। बंदर पूंछ ग्लेशियर भी गंगोत्री शिखर समूह का ही हिस्सा है, जहां एक ओर यमुना और दूसरी तरफ भागीरथी का उद्गम है। बंदर पूंछ पर्वत के ढलानों को यमुनोत्री मंदिर के पास से साफ देखा जा सकता है, जहां बर्फ समाप्त होने की स्थिति में है।


यमुनोत्री मंदिर के पुरोहित खिलानंद भारद्वाज बताते हैं कि 2024 में केदारनाथ जैसी बाढ़ का भयानक दृश्य यमुनोत्री में देखने को मिला है। अब ऊपर से ग्लेशियर तो पहले जैसा नहीं है। यमुनोत्री और गंगोत्री ग्लेशियर के पास रहने वाले खरसाली, जानकी चट्टी, हनुमान चट्टी, सुखी, जसपुर, झाला, हरसिल आदि गांव के लोग बताते हैं कि बीते 30 वर्षों से बर्फ पड़ना कम हो गया है। सेना से अवकाश प्राप्त मोहन सिंह राणा कहते हैं कि चारों ओर चौड़ी पत्ती की वन प्रजातियां और वन्य जीव दुर्लभ होते जा रहे हैं। इतने ऊंचे स्थान पर रहने वाले लोग भी देहरादून जैसी गर्मी महसूस करने लगे हैं।


केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट कह रही है कि बर्फीली झीलों और अन्य जल निकायों में 2011 से 2024 के बीच 10.81 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। झीलों का विस्तार तेजी से पिघल रहे ग्लेशियरों के कारण हो रहा है। 30 वर्षों में हिमालय क्षेत्र के अध्ययन से पता चलता है कि बर्फीली झीलों और ग्लेशियरों के टूटने से भीषण आपदाएं आती हैं। भविष्य में इसको रोकना है, तो गंगा और यमुना के जल ग्रहण क्षेत्रों के जंगल, जमीन बचाने के मजबूत उपाय ढूंढने पड़ेंगे। पर्यावरण और विकास के बीच की दुश्मनी को त्यागना पड़ेगा। अंधाधुंध पर्यटकों के लिए ग्लेशियर के ऊपर हवाई सेवाएं और गाड़ियों के धुएं को नियंत्रित करना पड़ेगा। वनों का कटान रोकने के साथ नदियों के जल ग्रहण क्षेत्रों में पर्याप्त जैव विविधता के संरक्षण में सरकार को समाज की मदद करनी होगी। अतः जलवायु परिवर्तन जितना  वैश्विक संकट है, उतना ही मानवीय हस्तक्षेप का मौका भी है। जिसके कारण हिमालय से लेकर मैदान तक विकास के अंधानुकरण से पैदा हुए प्रकृति के शोषण, अतिक्रमण और प्रदूषण ग्लेशियरों को पिघलाने में सहायक बन रहे हैं।

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