मुल्क के विभिन्न हिस्सों से आकर इस्लामाबाद में प्रदर्शन कर रहे पाकिस्तान तहरीक-ए इन्साफ (पीटीआई) के समर्थकों एवं कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए जिला प्रशासन ने इस्लामाबाद के सभी प्रवेश मार्गों पर सैकड़ों कार्गो कंटेनर रखे थे, ताकि कोई भी प्रदर्शनकारी या उनके वाहन अंदर न जा सकें। सभी सड़कें बंद कर दी गई थीं और आप रावलपिंडी से भी प्रवेश नहीं कर सकते थे। कुछ विदेशी जो पहली बार इस्लामाबाद आए थे, पूरी तरह से भ्रमित थे, क्योंकि उन्होंने कार्गो कंटेनर देखे, जो आमतौर पर समुद्री बंदरगाहों पर देखे जाते हैं। विदेशियों को यह समझाने में कुछ समय लगा कि राजधानी में वास्तव में क्या हो रहा था। विरोध प्रदर्शन और धरना किसी भी पाकिस्तानी का सांविधानिक अधिकार है, लेकिन पीटीआई चेयरमैन के साथ समस्या यह है कि वह चाहते हैं कि हजारों प्रदर्शनकारी संवेदनशील इलाके में डेरा डालें, जहां सुप्रीम कोर्ट, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय और पास में ही डिप्लोमैटिक एन्क्लेव जैसी महत्वपूर्ण इमारतें हैं।
इमरान खान के समर्थकों ने पहले भी सारे नियम-कानूनों को ध्वस्त करते हुए संसद भवन पर हमला किया था, इसलिए प्रशासन ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी। इससे टकराव की स्थिति पैदा हो रही थी, क्योंकि मोबाइल सेवाएं, ट्विटर, इंटरनेट सेवाएं या तो बंद कर दी गईं या धीमी कर दी गई थीं, जो एक बहुत ही खतरनाक कदम था। विरोध प्रदर्शन की शुरुआत में टीवी चैनलों पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई थी, जो शुरुआत में ठीक उनकी नाक के नीचे हो रही घटनाओं की पूरी तरह से अनदेखी कर रहे थे। यहां तक कि समसामयिक कार्यक्रमों में इस मुद्दे पर चर्चा होने के बावजूद प्रदर्शन स्थल से कोई लाइव रिपोर्टिंग नहीं हो रही थी। इस बीच, इस्लामाबाद उच्च न्यायालय ने भी अपने फैसले में पीटीआई के किसी भी विरोध प्रदर्शन पर रोक और धारा 144 लगा दी थी, लेकिन इससे प्रदर्शनकारी रुके नहीं। हालांकि देश भर से हजारों सुरक्षाकर्मियों को बुलाया गया था, फिर भी सरकार ने सेना को तैनात करने का आदेश दिया और प्रदर्शनकारियों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए। इससे काफी बवाल मचा और मीडिया तथा गैर-पीटीआई सदस्यों ने भी इसकी निंदा की, क्योंकि ऐसा लगा कि सुरक्षा प्रतिष्ठान अपने ही नागरिकों के खिलाफ युद्ध की तैयारी कर रहा था। लेकिन भीड़ को इस्लामाबाद में प्रवेश करने से नहीं रोका जा सका, क्योंकि खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री भारी सरकारी मशीनरी लेकर कंटेनरों को हटा रहे थे।
पीटीआई ने बुधवार को अपना धरना समाप्त कर दिया और राजधानी से चले गए, लेकिन इस बीच कई दिलचस्प पहलू सामने आए हैं। पीटीआई इमरान खान और जेलों में बंद अन्य राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग कर रही थी। उन्होंने यह भी मांग की कि उनका ‘चुराया हुआ जनादेश’ वापस किया जाए, जिसके कारण वे चुनाव जीतने से वंचित रह गए और उन्हें सरकार बनाने की अनुमति दी जाए। उनकी बात सही है, क्योंकि यह स्पष्ट था कि वे पिछला चुनाव जीते थे, लेकिन सुरक्षा प्रतिष्ठान ने सुनिश्चित किया कि इमरान खान प्रधानमंत्री न बनें। यह इतिहास के सबसे धांधली वाले चुनावों में से एक था।
इमरान खान की तीसरी पत्नी बुशरा बीबी की भूमिका महत्वपूर्ण है, जिन्होंने खैबर पख्तूनख्वा से आने वाले काफिले को अपहृत करने की कोशिश की, जिसका नेतृत्व वहां के मुख्यमंत्री अली अमीन गंधपुर कर रहे थे। भले ही इमरान खान जोर देते हैं कि वह एक गृहिणी हैं, लेकिन बुशरा बीबी ने पूरे विरोध प्रदर्शन में बहुत ही विध्वंसकारी भूमिका निभाई। जब प्रशासन ने रात के अंधेरे में क्रूर बल का प्रयोग करना शुरू किया, तो बुशरा बीबी और खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री, दोनों एबटाबाद के मनसेहरा शहर में चले गए और अपने बेचारे समर्थकों को अकेला छोड़ दिया। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव के कारण सैकड़ों लोग गिरफ्तार और घायल हुए। कई प्रदर्शनकारी हथियारबंद भी थे। उन्होंने विरोध प्रदर्शन की कमान पूरी तरह अपने हाथों में ले ली और कार्यकर्ताओं से कहा कि वह अपनी आखिरी सांस तक इस्लामाबाद में रहेंगी और इमरान खान की रिहाई के बाद ही यहां से जाएंगी।
यह दिलचस्प था, क्योंकि पहली बार एक पंजाबी महिला पख्तूनों के काफिले का नेतृत्व कर रही थी और उसे आम कार्यकर्ता का समर्थन भी मिल रहा था। लेकिन सुरक्षा बलों द्वारा क्रूर बल का प्रयोग अस्वीकार्य था, जिसमें कई मौतें हुईं और कई घायल हुए। चार सुरक्षाकर्मियों की मौतें हुईं, जबकि पीटीआई का दावा है कि उसके बारह कार्यकर्ताओं की जान चली गई। हालांकि सेना के जवानों ने कोई कार्रवाई नहीं की। लेकिन एक अजीब दृश्य तब देखने को मिला, जब कुछ युवा पख्तून प्रदर्शनकारी उस ऊंचे कंटेनर पर चढ़ गए, जहां सेना के जवान खड़े थे और उन्हें गले लगा लिया। उन्होंने सेल्फी भी खिंचवाई। इन दृश्यों का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। लेकिन यह गृहयुद्ध जैसी स्थिति अभी खत्म नहीं हुई है, अब देखना यह है कि इमरान खान तर्कसंगत रास्ता अपनाते हैं और सरकार पर दबाव बनाने के लिए विपक्षी दलों से बातचीत करते हैं या सरकार से बातचीत शुरू करते हैं, क्योंकि इसका जवाब राजनीतिक समाधान में ही छिपा है। जैसा कि राजनीतिक विश्लेषक और लेखक जाहिद हुसैन बताते हैं, ‘अपनी दोषपूर्ण लोकलुभावन बयानबाजी के बावजूद जेल में बंद इमरान खान मुल्क के सबसे शक्तिशाली नेता हैं। शायद मुल्क के इतिहास में किसी अन्य नेता को वर्ग विभाजन से परे इतना व्यापक समर्थन नहीं मिला है।’