बर्ट मुगाबे को पिछले दिनों जिंबाब्वे के राष्ट्रपति पद से हटना पड़ा। 93 वर्षीय मुगाबे तबसे सत्ता में थे, जब उन्होंने 1980 में अपने देश को ब्रिटेन से आजाद कराने में सफलता प्राप्त की थी। वह 1987 तक प्रधानमंत्री रहे, फिर राष्ट्रपति बन गए। आखिर मुगाबे को सत्ता से बेदखल करने की वजह क्या है?
मुगाबे एक विवादास्पद नेता हैं। उनके देश की आर्थिक बदहाली के लिए उन्हें जिम्मेदार माना जाता है। सैंतीस साल के उनके शासन के दौरान जिंबाब्वे की आर्थिक स्थिति नाटकीय रूप से बदहाल होती चली गई। वहां मुद्रास्फीति की दर पांच सौ अरब फीसदी तक बढ़ गई, जिसके पीछे स्थानीय मुद्रा में अप्रत्याशित तरीके से की गई बढ़ोतरी को जिम्मेदार माना जाता है। स्थानीय मुद्रा के महत्व खोने के बाद वहां अनेक देशों की मुद्रा आधिकारिक रूप से मान्य हो गई, जिनमें भारतीय रुपया भी शामिल था। वहां के केंद्रीय बैंक नाकारा साबित हो गया। 2008 में बेतहाशा महंगाई के कारण वहां सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में भारी गिरावट दर्ज की गई थी। इस वजह से अनेक उत्पादन इकाईयां बंद हो गईं। गरीबी और बेरोजगारी में बेतहाशा वृद्धि हो गई। देश के युवाओं के पास रोजगार के बहुत सीमित अवसर रह गए थे। देश के निर्यात में भारी गिरावट आने के कारण चालू खाते का घाटा बेतहाशा बढ़ गया। देश जिस राजनीतिक और आर्थिक जोखिमों से जूझ रहा था, उसमें विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने निवेश से हाथ खींच लिए।
ऐसा माना जाता है कि जिंबाब्वे की आर्थिक बदहाली के पीछे सबसे बड़ा कारण मुगाबे द्वारा शुरू किया गया सुधार कार्यक्रम था। इसके तहत अमीर श्वेत वाणिज्यिक किसानों से जमीन अधिग्रहीत कर उसका गरीब और भूमिहीन अश्वेत किसानों में वितरण किया गया। इससे श्वेत किसानों और अश्वेत जिंबाब्वाई किसानों के बीच टकराव पैदा हो गया, हिंसा भड़क उठी। श्वेत किसानों की शिकायत थी कि उन्हें जमीन के बदले मुआवजा नहीं दिया गया। लेकिन यह भी सच है कि भूमि सुधार से पहले खेती योग्य जमीन का बड़ा हिस्सा कुछ हजार श्वेत किसानों के पास ही था, सो उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत मजबूत थी। भूमि सुधार के कारण जमीन बड़े पैमाने पर वितरण किया गया, मगर इसके कारण कुल कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आ गई।
उदाहरण के लिए, एक समय जिंबाब्वे तंबाकू का एक बड़ा उत्पादक था। जमीन वितरण के कारण इसमें गिरावट आई। कृषि क्षेत्र की समृद्धि के कारण जिंबाब्वे को दक्षिण अफ्रीका का 'ब्रेड बॉस्केट' तक कहा जाता था। आज यह देश खाद्य असुरक्षा से जूझ रहा है और इसकी आबादी का बड़ा हिस्सा कुपोषण का शिकार है।
पश्चिमी देशों ने जमीन सुधार को अलोकतांत्रिक करार दिया और उनके मुताबिक यह मानवाधिकारों का उल्लंघन था। नतीजतन अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने जिंबाब्वे पर प्रतिबंध लाद दिए, जिसकी उसे भारी आर्थिक और सामाजिक कीमत चुकानी पड़ी। अमेरिकी कांग्रेस ने जिंबाब्वे डेमोक्रेसी ऐंड इकोनॉमिक रिकवरी ऐक्ट, 2001 पारित किया था, ताकि उस पर आर्थिक प्रतिबंध थोपे जा सकें। यूरोपीय संघ ने जिंबाब्वे की सरकार से संबंधित कंपनियों की संपत्ति जब्त कर ली थी। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने जिंबाब्वे को दी जा रही मदद वापस ले ली थी। ऐसे बहुत से कारण थे, जिनसे जिंबाब्वे की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर गई। मुगाबे की जगह पूर्व राष्ट्रपति इमर्सन मनगागवा ने देश की कमान संभाल ली है। नए राजनीतिक नेतृत्व में उम्मीद है जिंबाब्वे एक नई शुरुआत करेगा।