यह सेक्टर वर्तमान में करीब 280 अरब डॉलर की वित्तीय क्षमता रखता है। उदाहरण के लिए, वर्ष 2013-14 में औसतन वेतन प्रारंभिक स्तर पर 3 से 4 लाख रुपये के बीच में था, जो अब 3.8 से 4.5 लाख रुपये के बीच में देखा जा रहा है। यानी 10 वर्षों में वेतन वृद्धि 70 से 80 हजार रुपये के बीच में ही दर्ज हुई है। इन हालात में 20 से 25 साल के युवा आर्थिक प्रगति के सपने किस रूप में देखेंगे? करीब 50 लाख लोग आईटी से रोजगार पा रहे हैं, इनमें करीब 20 प्रतिशत फ्रेशर्स हैं।
आईटी सेक्टर की कंपनियों के अंतर्गत बीपीओ, केपीओ पिछले कुछ दशकों से समाज में बड़े प्रचलित नाम हैं, लेकिन अब सभी बड़ी आईटी कंपनियां प्रारंभिक स्तर पर वेतन कम करने के साथ ही छंटनी भी कर रही हैं। मशहूर कंपनी टीसीएस द्वारा 12 हजार प्रारंभिक स्तर के कर्मचारियों की छंटनी अचंभित करने वाली है। वर्ष 2022-23 में इस क्षेत्र के अंतर्गत छह लाख युवाओं को प्रारंभिक स्तर पर रोजगार मिला था, जो अब एक ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक, 75 प्रतिशत कमी के साथ डेढ़ लाख रह गया है। ऐसा नहीं है कि इन कंपनियों की आय व मुनाफे में कमी आई है। बल्कि, बढ़ोतरी ही हुई है। चालू वित्तीय वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही, अप्रैल से जून के अंतर्गत टीसीएस की वित्तीय आय में 1.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह 7,000 करोड़ रुपये से अधिक थी और वहीं मुनाफा करीब छह प्रतिशत बढ़ा। इन्फोसिस की वित्तीय आय 7.5 प्रतिशत से बढ़ी। एचसीएल ने इसमें आठ प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। अचंभे की बात यह है कि छोटे कर्मचारियों की आमदनी गिरी है, तो उच्च स्तर पर बेहताशा वृद्धि दर्ज हुई है। सीईओ के पद पर एक दशक पहले जहां वार्षिक वेतन चार से पांच करोड़ के बीच में था, वह अब 80 से 85 करोड़ हो गया है और इसी तरह के आंकड़े सभी बड़ी कंपनियां में हैं।
आईटी कंपनियां इस पर प्रारंभिक स्तर के युवाओं के पूर्ण रूप से तकनीकी दक्ष नहीं होने का तर्क दे रही हैं, जिसके अंतर्गत मुख्यतः आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के पक्ष पर शैक्षणिक स्तर की कमी है। तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है कि कोरोना काल में एकाएक डिजिटलाइजेशन की मांग बढ़ी थी, तब इन कंपनियों ने वेतनवृद्धि के साथ ही वर्क फ्रॉम होम की सुविधा दी। कुछ कर्मचारी अब भी उसी वेतन में घर से काम कर रहे हैं, लेकिन कंपनियां छोटे शहरों और महाविद्यालयों से नए स्नातकों को भर्ती करने से कतरा रही हैं। बहरहाल, अगर यह सब लगातार चलता रहा, तो इस बात को समझने में कोई गुरेज नहीं कि भारतीय मध्यम वर्गीय समाज के लिए अब आईटी क्षेत्र की कंपनियों का सपना एक आकर्षक रोजगार के लिए नहीं रहेगा।