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पड़ताल : रातोंरात की नहीं है दून आपदा, बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप से टूटी है विपदा

प्रेम प्रताप सिंह
Updated Fri, 19 Sep 2025 07:06 AM IST

सार

देहरादून के एक से दूसरे छोर तक यही कहानी है। नहरों का फैला जाल और वातावरण में घुलती बासमती की महक इस शहर की पहचान थी। यह पहचान खो गई है। नहरें बंद हो चुकी हैं। पानी की निकासी का कोई इंतजाम नहीं है।
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देहरादून आपदा - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी


उत्तराखंड के पहले लोकायुक्त एएस रजा के निर्देश पर 2006 में तत्कालीन नारायण दत्त तिवारी सरकार ने शहर से गुजरने वाली रिस्पना और विंदाल नदी का सर्वे कराया था, जिसमें यह तथ्य सामने आया था कि दोनों नदियों पर दस हजार से ज्यादा अतिक्रमण पाए गए थे। इन्हें हटाया नहीं गया। उल्टे, नदियों के भीतर अतिक्रमण बढ़ता गया। हालात बेकाबू होते गए। नदियों के प्रवाह को रोकने में नेताओं से लेकर अफसरों तक मददगार और गुनहगार रहे हैं।


हालांकि, नारायण दत्त तिवारी ने चीन यात्रा से वापस आने के बाद एलान किया था कि राजधानी की दोनों ही नदियों को चीन की एक नदी की तर्ज पर जीर्णोद्धार किया जाएगा, लेकिन तब कांग्रेस में ही इसका विरोध शुरू हो गया था।  2010 में भाजपा सरकार के कार्यकाल में गढ़वाल के तत्कालीन आयुक्त उमाकांत पंवार, मेयर विनोद चमोली और मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) के तत्कालीन उपाध्यक्ष आरके सुधांशु (अब प्रमुख सचिव सीएम) अहमदाबाद गए थे। वापस आने के बाद कहा गया था कि साबरमती की दर्ज पर इनका कायाकल्प किया जाएगा, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं हुआ।


एक दशक पहले नैनीताल हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि प्रदेश की नदियों के आंगन को छोड़ दीजिए। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य की नदियों के 200 मीटर के दायरे में किसी भी प्रकार के निर्माण पर रोक लगा दी थी। इस दौरान राज्य में सरकारें बदलती रहीं। साथ ही नदियों के किनारे होटल, रिजॉर्ट और आवासीय कॉलोनियां बनती रहीं। कोई रोक नहीं पाया। हर कोई मौका मिलते ही प्रकृति के बेहद करीब रहने के लिए हर हथकंडे अपनाता रहा।


2004 तक सहस्रधारा के पास चंद दुकानें होती थीं। ऊपर वाले इलाके में पॉलीथिन से ढकी मैगी, चाय की दुकानें चलती थीं। सहस्रधारा का अर्थ है जहां से कई धाराएं निकलती हैं।  लेकिन डेढ़ दशक में सहस्रधारा की तलहटी तक कंकरीट के जंगल उग चुके थे। तमाम धाराओं के प्रवाह के रास्ते बंद हो गए, जिसका नतीजा 15 सितंबर की रात के तौर पर सामने आया है।


देहरादून के एक से दूसरे छोर तक यही कहानी है। नहरों का फैला जाल और वातावरण में घुलती बासमती की महक इस शहर की पहचान थी। यह पहचान खो गई है। नहरें बंद हो चुकी हैं। पानी की निकासी का कोई इंतजाम नहीं है। घाटी की पहचान अत्याधुनिक शहर और चकाचौंध के रूप में हो चुकी है, जिससे प्रकृति अब अपना हिसाब बराबर कर रही है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी के धराली में पांच अगस्त को आई आपदा के पीछे भी ऐसा मामला सामने आया था कि खीरगंगा नदी के रास्ते में आबादी बस गई थी। 29 अगस्त को बागेश्वर के पौंसारी गांव में आई आपदा के दौरान कई लोगों की मौत हुई थी, जिसका कारण गधेरे (छोटी जलधारा) के रास्ते में मकान बना हुआ था।

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