चुनावों में किसी का हारना, किसी का जीतना लोकतंत्र का बुनियादी उसूल है। जिन देशों में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं, वहां चुनावों के बाद प्रतिद्वंद्वी एक दूसरे से बैर रखने के बदले एक दूसरे का सम्मान करते हैं।
पिछले सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज हर्बर्ट वॉकर बुश के अंतिम संस्कार में वे पूर्व राष्ट्रपति भी शामिल हुए, जो चुनावों में कभी उनके प्रतिद्वंद्वी हुआ करते थे। बिल क्लिंटन ने बुश को हराया था, लेकिन बाद में उनकी पक्की दोस्ती हो गई थी। बावजूद इसके कि क्लिंटन डेमोक्रेटिक पार्टी के हैं और बुश रिपब्लिकन पार्टी के थे।
हमारे देश में अभी तक यह परंपरा नहीं बनी है। या शायद कभी थी, लेकिन अब नहीं रही है। सो 16 मई, 2014 को जब लोकसभा चुनाव के परिणाम आए, तब सोनिया गांधी और उनके बेटे ने अपनी पराजय स्वीकार करते हुए और नई सरकार को शुभकामनाएं देते हुए नरेंद्र मोदी का नाम तक नहीं लिया। पिछले चार साल में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच कड़वाहट इतनी बढ़ गई है कि जिन पांच राज्यों के परिणाम कल आने वाले हैं, उनके चुनाव अभियान में मुद्दे पीछे रह गए और तू-तू मैं-मैं को प्राथमिकता मिली।
प्रधानमंत्री ने कड़े शब्दों में कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा कि उनकी माता और पिताजी को राजनीति में घसीट कर लाना गलत था। तो उधर कांग्रेस प्रवक्ताओं ने कहना शुरू कर दिया कि उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष की माताजी के बारे में नरेंद्र मोदी ने कई बार भला-बुरा कहा है। कांग्रेस अध्यक्ष का मजाक उड़ाना इतना आम हो गया है कि अमित शाह ने अपने हर भाषण में उनको ‘राहुल बाबा’ कहा और भाजपा के अन्य नेता उनको लगातार पप्पू कहते रहे हैं।
चुनाव अभियान को गाली-गलौज में बदलने में सबसे माहिर हैं हैदराबाद के ओवैसी बंधु। अकबर ओवैसी ने योगी आदित्यनाथ के बारे में जो कुछ कहा, वह इतना भद्दा था कि शालीनता की सारी हदें पार कर गया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इस भद्दी स्पर्धा में भाग लेते हुए अपने भाषण में यहां तक कहा कि तेलंगाना में अगर भाजपा की सरकार बनती है, तो ओवैसी बंधुओं को वहां से भगा दिया जाएगा। क्या योगी भूल गए थे कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां प्रतिद्वंद्वियों को चुनावों में हराया जाता है, भगाया नहीं जाता?
दुख की बात यह है कि हमारे राजनेता अशालीन भाषण देने के बाद आगे निकाल जाते हैं, लेकिन खामियाजा इस गरीब देश को भुगतना पड़ता है, जहां अपने राजनेताओं की नाकामी के कारण दशकों से हम रोटी, कपड़ा, मकान और बिजली, पानी, सड़क के मुद्दों से आगे नहीं बढ़ पाए हैं। इन पांच राज्यों के चुनाव अभियान में दोनों राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दलों ने साबित कर दिया है कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों और सभ्यता के बारे में उन्हें अभी बहुत कुछ सीखना है।
पहली बात तो उन्हें यह सीखनी चाहिए कि सार्वजनिक जीवन में वे वास्तव में देश की सेवा करने के लिए आए हैं और चुनाव का मैदान युद्ध का मैदान नहीं होता। रणभूमि में दुश्मनों को मार गिराने पर ही विजय मिलती है। लेकिन चुनाव की भूमि अलग है। यहां प्रतिद्वंद्वी होते हैं, दुश्मन नहीं। हमारे राजनेता जिस दिन इस बुनियादी अंतर को समझेंगे, शायद उस दिन देश की सेवा करने की भावना के साथ सामने आएंगे, सिर्फ चुनावों में सत्ता हासिल करने के लिए नहीं। पिछले सप्ताह समाप्त हुए चुनाव अभियान को देखा जाए, तो वह दिन अभी दूर है, बहुत दूर।