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मदद की कीमत चाहते हैं ट्रंप

मनोज जोशी Updated Fri, 07 Dec 2018 07:04 PM IST
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ट्रंप और इमरान

अफगान शांति वार्ता में सहयोग के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अपील का मकसद पाकिस्तान पर दबाव बनाना है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को लिखे एक पत्र में ट्रंप ने वार्ता के जरिये अफगान गृहयुद्ध को खत्म करने के अमेरिकी प्रयासों को पाकिस्तान का पूर्ण समर्थन देने का आग्रह किया है। उनका यह कहना कि पाकिस्तान के पास अपनी धरती पर तालिबान को पनाह न देने की क्षमता है, वास्तव में एक चेतावनी है कि अगर उसने अमेरिका के साथ सहयोग नहीं किया, तो अमेरिका सभी सहायता में कटौती कर पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा सकता है।



लेकिन इस तस्वीर का एक अन्य पहलू भी है, जैसा कि अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर लेफ्टिनेंट कैनेथ मेकेंजी ने चार दिसंबर को खुलासा किया। अपनी इस नई भूमिका की पुष्टि के लिए आयोजित सुनवाई में उन्होंने अमेरिकी सशस्त्र सेवा समिति के सदस्यों को बताया कि हम लगातार देख रहे हैं कि पाकिस्तान एक स्थिर और एकजुट अफगानिस्तान के बजाय तालिबान का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर रहा है। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान के प्रति पाकिस्तान के रवैये अथवा आतंकी समूहों के खिलाफ उसके व्यवहार में बहुत ज्यादा परिवर्तन उन्हें नहीं दिखा है।

 

ट्रंप को एहसास है कि अमेरिका एक मुश्किल परिस्थिति में फंसा हुआ है, क्योंकि जब वह राष्ट्रपति बने तो उन्हें एक बुरा और जटिल सहयोगी मिला। पर चूंकि वह ' सम्मानजनक और स्थायी परिणाम' चाहते हैं, इसलिए उन्होंने अमेरिकी सेना की मौजूदगी में मामूली वृद्धि को स्वीकृति दी और अफगानिस्तान में अमेरिकी बलों के इस्तेमाल के लिए सैन्य कमांडरों पर से प्रतिबंध हटा लिया। यहां तक कि पाकिस्तान को 'बाहरी पनाह और आतंकियों का समर्थन' खत्म करने की चेतावनी देते हुए उन्होंने अफगानिस्तान में स्थिरता लाने के लिए भारत की सहायता मांगी थी। एक वर्ष बाद ट्रंप ने पटरी बदलते हुए अफगान में जन्मे अमेरिकी राजनयिक जलमय खालीजाद को तालिबान के साथ शांति समझौता के लिए विशेष दूत के रूप में नियुक्त किया।


अमेरिका पाकिस्तान से जो आज कह रहा है, वह पहले भी कहा जा चुका है कि, इस्लामाबाद तालिबान को आश्रय दे रहा है और कि अगर वह अमेरिका के साथ सामान्य संबंध चाहता है, तो शांति स्थापित करने के लिए तालिबान पर दबाव बनाए। अंतर सिर्फ यह है कि अभी ट्रंप द्वारा नियोजित विशेष शैली में ऐसा कहा जा रहा है। इसमें अमेरिका की सख्त चेतावनी और कार्रवाई भी शामिल है। पिछले महीने ट्रंप ने फॉक्स न्यूज को बताया कि पाकिस्तान ने अमेरिकी सहायता के रूप में अरबों डॉलर लेने के बावजूद अमेरिका के लिए कुछ भी नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि ओसामा बिन लादेन को मजे की जिंदगी जीते पाया गया था और 'उन्होंने पाकिस्तान को पैसा देना बंद कर दिया, क्योंकि वह अमेरिका के लिए कुछ नहीं करता है।' हाल के महीनों में पेंटागन ने इस्लामाबाद को दी जाने वाली सैन्य सहायता में 30 करोड़ डॉलर की कटौती की और अमेरिकी संसद ने गठबंधन समर्थन निधि में कोई 50 करोड़ डॉलर को रद्द कर दिया, जो उसे आतंकवाद से लड़ने की एवज में दिया जाता है।

 

इससे पहले ट्रंप ने ट्वीट किया था कि 'अमेरिका ने पिछले 15 वर्षों में पाकिस्तान को मूर्खतापूर्वक 33 अरब डॉलर से ज्यादा सहायता दी थी और उन्होंने हमारे नेताओं को मूर्ख समझते हुए हमें झूठ और छल के अलावा कुछ नहीं दिया।' उन्होंने आगे कहा कि 'जिन आतंकियों का हम अफगानिस्तान में शिकार करते हैं, उन्हें पाकिस्तान ने सुरक्षित पनाह दी। लेकिन अब और नहीं!'


इमरान खान ने ट्रंप पर पलटवार करते हुए कहा था कि आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी लड़ाई का खामियाजा पाकिस्तान को वहन करना पड़ा, जिसने अपने 75,000 लोगों को खोया और अर्थव्यवस्था को 123 अरब डॉलर का नुकसान झेलना पड़ा। उन्होंने आगे कहा कि इस्लामाबाद वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित 10,000 से अधिक अमेरिकीकर्मियों के लिए अपनी सड़कों और वायु मार्ग की सुविधा प्रदान करता है।


अमेरिका पाकिस्तान को मजबूर कर रहा है कि वह तालिबान को वार्ता की मेज पर लाए। खालीजाद इस्लामाबाद, काबुल और दोहा (जहां तालिबान का कार्यालय है) का दौरा कर चुके हैं, पर उनके प्रयासों का अब तक फायदा नहीं हुआ है। फिर भी पिछले महीने दोहा में तालिबान के अधिकारियों के साथ बैठक के बाद उन्होंने घोषणा की कि अप्रैल, 2019 में एक समझौता किया जाएगा। हालांकि तालिबान ने इससे इनकार करते हुए कहा है कि अमेरिका और उनके बीच कोई समझौता नहीं हुआ है। इमरान खान को ट्रंप का पत्र इस महीने के प्रारंभ में शुरू होने वाले खालीजाद के दौरे के प्रति इस्लामाबाद का रुख नरम करने के लिए था।
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अमेरिका इसलिए जल्दी में है, क्योंकि रूस ने पहले ही अफगान शांति वार्ता के नेतृत्व में बाजी मार ली है। पिछले महीने रूस ने अफगानिस्तान पर दूसरी मॉस्को प्रारूप बैठक आयोजित की, जिसमें न केवल तालिबान के प्रतिनिधि मौजूद थे, बल्कि भारतीय विदेश सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी भी थे। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति गनी ने उच्च शांति परिषद का एक शिष्टमंडल भेजा, जिसका गठन अफगान सुलह को बढ़ावा देने के लिए किया गया है। मॉस्को स्थित अमेरिकी दूतावास के एक अमेरिकी राजनयिक भी पर्यवेक्षक थे। तालिबान इस बात पर अड़े हुए हैं कि बातचीत की मेज पर बैठने से पहले वह सभी अमेरिकी सैनिकों की वापसी चाहते हैं। लेकिन अमेरिका कुछ सैनिकों को वहां बनाए रखना चाहता है।

 

दंडात्मक उपाय के अलावा अमेरिका ने पाकिस्तान को यह संकेत देने के लिए भी कदम उठाया है कि दोनों देश एक साथ मिलकर व्यवसाय कर सकते हैं। अमेरिकी संसद ने अमेरिकी रक्षा बजट के प्रावधान में से लश्कर-ए तैयबा को हटा दिया है, जिसकी जरूरत ट्रंप प्रशासन को लश्कर-ए तैयब्बा और हक्कानी नेटवर्क की गतिविधियों को बाधित करने के लिए थी। ट्रंप के पत्र के जवाब में पाकिस्तानी अधिकारी ने खालीजाद को आश्वस्त किया कि इस्लामाबाद अफगान युद्ध समाप्त करने के लिए तालिबान के साथ समझौते में मदद करेगा। लेकिन उन्होंने पहले ही इसका शोर मचा दिया है, और अमेरिका यह जानता है। अब यह देखना बाकी है कि ट्रंप किस तरह पाकिस्तान के झूठ से निपटते हैं।

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