एक दफे बदसूरती और खूबसूरती समंदर मे नहाने के लिए गईं। कपड़े उतार कर दोनों समंदर में उतरीं। बदसूरती नहाकर पहले बाहर आ गई और खूबसूरती के कपड़े पहनकर चलती बनी। जब खूबसूरती बाहर आई, तो बड़ी शर्माई। लाज बचाने के लिए वहां जो मिला, वही पहनना पड़ा। अब उसके तन पर बदसूरती के कपड़े थे। कहते हैं, इसीलिए लोग कपड़ों से धोखा खाकर एक को दूसरी समझ लेते हैं। हालांकि कुछ लोगों ने असली कपड़ों के साथ उनके चेहरे भी देख लिए थे, इसलिए वे बदले कपड़ों के बावजूद उन्हें पहचान लेते हैं। इसी से खूबसूरती की रोशनी बरकरार रहती है। यह कहानी, लोकतंत्र की अंतर्निहित जटिलताओं में हमें विकट संकेतों को समझने के लिए भी बहुत काम आ सकती है। अगर यह हम जान लें तो, लोकतंत्र की खूबसूरती की रोशनी कायम रख सकेंगे।