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मिस्र की तीन क्रांतियां

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अगर मिस्र की वर्तमान हालत में आप कोई उम्मीद की किरण खोजना चाहते हैं, तो मेरी सलाह यही होगी कि आप तीस हजार फुट की ऊंचाई पर चले जाएं और वहां से नीचे देखें। उस ऊंचाई से आप मिस्र में पिछले ढाई वर्षों में बदले हालात को समझ सकेंगे। मिस्र ने, असल में, 2011 से तीन क्रांतियां देखी है; और जब आप उन तीनों क्रांतियों का विश्लेषण करेंगे, तभी जान सकेंगे कि वहां की बहुसंख्यक आबादी आखिर चाहती क्या है?
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पहली क्रांति मिस्र की आम जनता और वहां की सेना ने की, जिसमें राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को सत्ता से बेदखल कर पूर्व रक्षा मंत्री मोहम्मद हुसैन तांतावी को कार्यकारी राष्ट्र-प्रमुख बनाया गया। तांतावी और उनके सहयोगी राष्ट्र को संभालने में बिल्कुल ही नाकाम रहे, जिसका परिणाम यह निकला कि उनकी सरकार भी एक क्रांति द्वारा गिरा दी गई और मुस्लिम ब्रदरहुड की पार्टी सत्ता में आई, जिसके मुखिया मोहम्मद मुर्सी राष्ट्रपति बने।

मुर्सी ने सेना के पर कतरने के साथ ही मुस्लिम ब्रदरहुड समर्थकों को प्रमुख स्थानों पर नियुक्त कर जल्दी ही अपनी ताकत बढ़ाने का प्रयास शुरू किया। उनकी निरंकुशता, सबको साथ लेकर न चलने की शैली और विफल आर्थिक नेतृत्व ने आम जन में भय का माहौल बनाया, जिस कारण वहां की जनता ने पिछले महीने सैन्य अधिकारियों की नई पीढ़ी के साथ मिलकर तीसरी क्रांति की आधारशिला रखी, ताकि ब्रदरहुड को सत्ता से हटाया जा सके।
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मिस्र की पहली क्रांति नकारा हाथों से छुटकारा पाने के लिए की गई थी, तो दूसरी जड़ व्यक्तियों के खिलाफ। तीसरी क्रांति अंधी गली से बाहर निकलने के लिए की गई।

पहली क्रांति इसलिए हुई, क्योंकि मिस्र के अधिकतर लोग, खासकर गैर मुस्लिम युवा उस मुबारक युग में बड़े हुए, जिसमें उन्हें दमघोंटू नीतियों का सामना करना पड़ा। मुबारक का कार्यकाल इतना निष्क्रिय था कि अनेक युवाओं को लगता था कि वे एक अदूरदर्शी नेता के नेतृत्व वाले ऐसे भ्रष्ट तंत्र में रह रहे हैं, जहां उन्हें अपनी वास्तविक क्षमता परखने का कोई मौका नहीं मिलने वाला।

स्थिति का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि मुबारक शासन के तीस साल और करीब 30 अरब डॉलर की अमेरिकी मदद के बाद भी कमोबेश एक-तिहाई मिस्रवासी अब भी निरक्षर हैं।

हालांकि जिन सेनाध्यक्षों ने मुबारक को सत्ता से बेदखल किया, वे भी नकारा साबित हुए। हालात ऐसे बने कि कुछ उदार लोगों ने जून 2012 के चुनाव में, जो मुबारक युग की समाप्ति के बाद हुआ था, मुस्लिम ब्रदरहुड के पक्ष में वोट देना मुनासिब समझा। लेकिन मोहम्मद मुर्सी ने बेहतर शासन करने के बजाय मुस्लिम ब्रदरहुड की ताकत बढ़ाने की तरफ ही ज्यादा ध्यान देना शुरू किया। नतीजतन उन्होंने मिस्र को ऐसी अंधी गली में धकेल दिया कि मिस्रवासी विगत 30 जून को फिर से सड़कों पर उतरने को बाध्य हुए।

इन तीनों क्रांतियों में निहित बहुसंख्यक मिस्रवासियों का संदेश स्पष्ट है। उन्हें नकारा ताकतें नहीं, बल्कि ऐसी सरकार चाहिए, जो मिस्र को फिर से अरब जगत का अगुआ राष्ट्र बनाए। उन्हें ऐसी सरकार की जरूरत है, जिसका नेतृत्व ऐसे सुयोग्य हाथों में हो, जो नए रोजगार का सृजन कर सके।

उन्हें ऐसी सरकार की भी आकांक्षा है, जो सामूहिकता में विश्वास करे और इस तथ्य को माने कि मिस्र की दो तिहाई आबादी गैर-मुस्लिम है। दरअसल, यह आकलन करना मुश्किल है कि मुर्सी के शासनकाल में अर्थव्यवस्था और कानून-व्यवस्था में कितनी गिरावट आई, लिहाजा अनेक मिस्रवासी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे।

हताश ऊंटवालों और पोस्टकार्ड बेचने वालों द्वारा हमला किए जाने संबंधी आशंका के कारण पर्यटकों को पिरामिड की तरफ नहीं जाने संबंधी चेतावनी जारी करने की वजह से भी अनेक टूरिस्ट गाइड बेरोजगार हो गए। वहां के जनमत अनुसंधान केंद्र ने पिछले सप्ताह जो सर्वेक्षण किया, उसका निष्कर्ष यही है कि 71 फीसदी मिस्रवासी मुर्सी के समर्थन में चलाए जा रहे विरोध-प्रदर्शनों के खिलाफ थे।

निश्चय ही मुर्सी को वोट के माध्यम से सत्ता से बेदखल करना बेहतर होता, लेकिन जो होना था, वह हो गया। अब हमें इस देश को और बेहतर बनाने की जरूरत है। राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिए बेहतर होगा कि वह न सिर्फ मिस्र को दी जा रही आर्थिक मदद में कटौती संबंधी आवाजों की अनसुनी कर दें, बल्कि मिस्र की नई सरकार को स्थापित और सफल बनाने में सहायता दें।

वहां लोग इसलिए चिंतित हैं कि कहीं मिस्र की सेना सत्ता पर अनंत काल तक अपना कब्जा न बनाए रखे। यह निश्चय ही खतरनाक होगा, लेकिन सच यह भी है कि मिस्र के लोग सशक्त हुए हैं, और वहां की बड़ी आबादी ने सरकार को गलत रास्ते पर चलने से रोका है।

मिस्रवासियों ने सही रास्ता पहचान लिया है और उस पर चलने के लिए बहुमत बनाने को उन्मुख हैं। इस दिशा में मौजूदा सरकार कुछ विश्वास जगाती दिखती है। इसके प्रमुख पदों पर अच्छे लोग हैं, जैसे वित्त और विदेश मंत्री के पद पर। उसका ध्यान फिलहाल निष्पक्ष संविधान और स्थायी आर्थिक सुधार की तरफ है।

अगर मुस्लिम ब्रदरहुड दोबारा राजनीति में उतरती है और सेना के खिलाफ इसका युद्ध रुकता है, तो इस सरकार का काम और आसान हो जाएगा। लेकिन ब्रदरहुड को भी समझने की जरूरत है कि उसने कई गड़बड़ियां की हैं और उसे लोगों का भरोसा दोबारा पाना है।

लिहाजा, अभी अमेरिका को मिस्र में जल्दी ही चुनाव कराने संबंधी दबाव डालने से बचने की जरूरत है। हमारा काम यह होना चाहिए कि हम नई सरकार को बेहतर आर्थिक निर्णय लेने में मदद करें और उस पर बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था बनाने को लेकर दबाव डालें। अगर ऐसा हुआ, तो निश्चय ही वहां लोकतांत्रिक चुनाव की बुनियाद तैयार हो सकेगी। इसके बगैर कितने भी चुनाव हो जाएं, हम मिस्र को नहीं बचा सकेंगे।
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